लालकिले से राहुल संबोधन

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लाल किले से राहुल बोले- मीडिया और सरकार देश में फैला रहे हैं डर

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता)

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नहीं, नहीं, ऐसा नहीं है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री नहीं बने हैं। चूंकि उनकी ‘भारत
जोड़ो यात्रा’ ने राजधानी दिल्ली में प्रवेश किया था, लिहाजा उन्होंने ऐतिहासिक लालकिला जाकर
जनता को संबोधित किया, लेकिन संबोधन सकारात्मक नहीं, आरोपों और विरोधाभासों से भरा था।
अभी तक की यात्रा के दौरान राहुल गांधी कहते रहे हैं कि देश में नफरत और डर का माहौल है। और
वह मुहब्बत की दुकान खोलने निकले हैं, लेकिन लालकिले से संबोधन में उन्होंने बार-बार कबूल किया
कि उन्हें अभी तक 2800 किलोमीटर की यात्रा में कहीं भी नफरत और हिंसा दिखाई नहीं दी। क्या
इस गहरे विरोधाभास का राहुल गांधी को एहसास है? यात्रा में कुत्ते, गाय, अन्य जानवर भी शामिल
हुए, लेकिन कोई हिंसा नहीं हुई। सवाल है कि भारत को जोडऩे इनसान, देश के नागरिक निकले हैं
अथवा यह ‘शिवजी की बारात’ का कोई नया संस्करण है? वैसे भी जिन पशुओं और जानवरों का
उल्लेख किया गया है, वे प्रकृति से हिंसावादी नहीं हैं।
बचाव में वे भी आक्रमण कर सकते हैं। एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि मुहब्बत की कोई दुकान
नहीं होती और न ही उसे बेचा-खरीदा जा सकता है। मुहब्बत तो मानसिक, आत्मिक भाव है, जो
महसूस किया जा सकता है और अपने व्यवहार से समाज में फैलाया जा सकता है। संभव हो, तो
राहुल गांधी संत कबीर के काव्य को पढ़ लें, तो मुहब्बत का सच समझ में आ जाएगा। इसके
अतिरिक्त, उन्होंने नफरत, डर के संदर्भ में पूरे टीवी चैनल मीडिया को ही लपेट लिया और कोसते रहे
कि चैनल ही नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं। वे 24 घंटे हिंदू-मुसलमान करने में व्यस्त हैं।
रिपोर्टरों की ओर इशारा करते हुए राहुल ने सुर बदले कि आपका कसूर नहीं है। जो आपके पीछे हैं, वे
नफरत, डर फैला रहे हैं। जाहिर है कि राहुल ने चैनल के संचालक उद्योगपतियों को अनाम निशाना
बनाया। जब राहुल चैनलों को कोस रहे थे, तभी सभी चैनल उनके संबोधन और यात्रा की प्रायोजित
भीड़ का सीधा प्रसारण कर रहे थे। अंतत: राहुल गांधी ने उगल ही दिया कि देश में मोदी की नहीं,
अंबानी और अडानी की सरकार है। राहुल भूल गए कि अंबानी को उभारने में उनकी दादी और पिता
प्रधानमंत्रियों का महत्त्वपूर्ण योगदान था। राहुल की आरोपिया दलीलें थीं कि यह लालकिला, रेलवे,
हवाई अड्डे, पब्लिक सेक्टर आदि सब कुछ उनके हाथों में हैं।
ताजमहल भी चला जाएगा। प्रधानमंत्री पर भी लगाम लगी है। बहरहाल राहुल गांधी के इन सद्वचनों
और आरोपों में उनकी राजनीतिक खीझ, कुंठा, हताशा ही झलकती हैं। अलबत्ता देश एक लोकतंत्र और
संविधान तथा उन्हीं के जरिए गठित भारत सरकार और राज्य सरकारों के माध्यम से बखूबी चल रहा
है। नागर विमानन और रेलवे का कोई पूर्ण निजीकरण नहीं किया गया है। राहुल जरा पूर्व प्रधानमंत्री
डॉ. मनमोहन सिंह से विमर्श कर जान लें कि विनिवेश क्या होता है और उसकी शुरुआत कब और
कहां से की गई थी? राहुल गांधी की यह सोच भी मिथ्या और बेबुनियाद है कि गरीब, कमजोर,
किसान आदि को कुचला, मारा जा रहा है। भारत तानाशाही वाला देश नहीं है। हिंदू धर्म में भी ऐसा

कोई जिक्र नहीं है। बेशक कांग्रेस नेता ने गीता, उपनिषद पढ़े होंगे, लेकिन वह यह नहीं बता सकते
कि पुराण और उपनिषद कितने हैं और उनके रचनाकार कौन हैं? बहरहाल राहुल गांधी, बेशक, दावा
करते रहें कि वह देश को जोडऩे निकले हैं। उनकी यात्रा राजनीतिक नहीं, सामाजिक मकसद की है।
यकीनन यह एक राजनीतिक यात्रा है, क्योंकि कांग्रेस प्रवक्ता अभी से ये बयान देने लगे हैं कि 2024
में राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री होंगे! यकीनन इस यात्रा से राहुल गांधी की छवि में कुछ सुधार देखा
जा सकता है, लेकिन वह भी आगामी चुनाव ही तय करेंगे। 2023 में ही देश के 9 राज्यों में
विधानसभा चुनाव होने हैं, तब पुष्टि हो जाएगी कि जो जन-सैलाब यात्रा से जुड़ा दिख रहा है, वह
वोटों में तबदील होगा या नहीं!

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