समाज के उत्थान और सुधार में स्कूल और धार्मिक संस्थान

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समाज के उत्थान और सुधार में स्कूल और धार्मिक संस्थान – Samar Saleel

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता) 

मूल्य ऐसे विश्वास हैं जो धारक के लिए उपयोगिता या महत्व में निहित हैं, "या" सिद्धांत, मानक,
या गुण सार्थक या वांछनीय परिलक्षित होते हैं। मूल्य आत्म-अवधारणा की एक महत्वपूर्ण विशेषता
को स्थापित करते हैं और व्यक्ति के लिए पर्यवेक्षी सिद्धांतों के रूप में कार्य करते हैं। स्कूलों युग में
मानव का जीवन अत्यंत सरल था। उस युग में ज्ञान की इतनी वृद्धि नहीं हुई थी जितनी आज हो
गई है। इसका कारण यह है कि उस युग में मानव की आवश्यकताएं सीमित थी तथा उन्हें परिवार
एवं अन्य अनौपचारिक साधनों के द्वारा पूरा कर लिया जाता था।
परंतु जनसंख्या की वृद्धि तथा जीवन की आवश्यकताओं की बाहुल्यता के कारण शैने-शैने: संस्कृति
का रूप इतना जटिल होता चला गया कि उसका सम्पूर्ण ज्ञान बालक को परिवार तथा अन्य
अनौपचारिक साधनों के द्वारा देना कठिन हो गया। इधर माता-पिता भी जीविकोपार्जन के चक्कर में
फंसने लगे। उनके पास बालकों को शिक्षा देने के लिए न तो इतना समय ही रहा और न वे इतने
शिक्षित ही थे कि वे उनको भाषा, भूगोल, इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, शरीर-रचना तथा
वैज्ञानिक अनुसंधानों के सम्पूर्ण ज्ञान की शिक्षा दे सकें।
अत: एक ऐसी नियमित संस्था की आवश्यकता अनभव होने लगी जो सामाजिक तथा सांस्कृतिक
सम्पति को सुरक्षित रख सके तथा उसे विकसित करके भावी पीढ़ी को हस्तांतरित कर सके। इस
दृष्टी से स्कूल का जन्म हुआ। ध्यान देने की बात है कि आरम्भ में स्कूलों से केवल उच्च वर्ग के
लोगों ने ही लाभ उठाया। जनसाधारण के लिए स्कूलों की स्थापना करना केवल आधुनिक युग की
देन है। जैसे-जैसे जनतंत्रवादी दृष्टिकोण विकसित होता गया, वैसे-वैसे स्कूलों के रूप में भी परिवर्तन
होता चला गया।
प्राचीनकाल से ही भारत एक धर्म प्रधान देश रहा है. परन्तु प्रारम्भ में हमारे देश में आदर्श धर्म देखने
को मिलता था, जिसमें आडम्बरों और अंधविश्वासों का कोई स्थान नहीं था. इसलिए भारतीय समाज
का विकास भी स्वस्थ परम्परा के अनुसार ही हो रहा था. लेकिन विदेशियों के आगमन के साथ ही
धीरे-धीरे सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में बुराइयों का प्रवेश प्रारम्भ हो गया और भारत में अंग्रेजी
शासन के कायम होने तक ये बुराइयां अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थीं. अंग्रेजी राज्य की स्थापना
के बाद हिन्दू धर्म अनेक कुरीतियों का शिकार हो गया जिसका प्रभाव समाज पर भी पड़ा. सम्पूर्ण
देश में अंधविश्वास और रूढ़िवादिता का अन्धकार छा गया. सती-प्रथा, बाल विवाह, बहु विवाह, जाति
प्रथा, बाल हत्या इत्यादि अनेक कुरीतियां समाज में व्याप्त हो गयी.
इन बुराइयों का अंत करने के लिए एक संगठित धर्म तथा समाज सुधार आन्दोलन प्रारंभ हुआ. इसी
दौरान एक समाज एवं धर्म सुधारक भारत के रंगमंच पर प्रकट हुए उन्होंने इस आंदोलन को व्यापक
रूप प्रदान किया. समाज सुधारकों में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, ईश्वर चंद्र

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विद्यासागर आदि प्रमुख हैं. धर्म एवं समाज सुधार आन्दोलन के पीछे कई कारण थे जैसे यूरोपीय
सभ्यता का प्रभाव, नवीन मध्यम वर्ग का उदय, सामाजिक गतिशीलता, सुधारकों का प्रभाव इत्यादि.
अंग्रेजी सरकार ने भी इन बुराइयों को दूर करने में भारतीय सुधारकों के साथ सहयोग किया. जिसका
परिणाम हुआ कि हमारा समाज अंधविश्वास और कुरीतियों से बिल्कुल मुक्त हो गया.
धर्म ने आज एक बहुत ही संस्थागत रूप ले लिया है। 'धर्म मूर्त और अमूर्त दोनों रूपों में पवित्र
विश्वास और प्रथाओं की एक प्रणाली है'। धर्म विचारधारा के साथ-साथ संस्था की दोहरी भूमिका
निभा सकता है। सांस्कृतिक पहचान देने में धर्म एक व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
धर्म एक नैतिक ढाँचा बनाने में मदद करता है और दैनिक जीवन में मूल्यों के लिए एक नियामक भी
है। यह विशेष दृष्टिकोण किसी व्यक्ति के चरित्र निर्माण में मदद करता है। दूसरे शब्दों में, धर्म
समाजीकरण की एक एजेंसी के रूप में कार्य करता है। इस प्रकार, धर्म प्रेम, सहानुभूति, सम्मान और
सद्भाव जैसे मूल्यों के निर्माण में मदद करता है।
कुछ धार्मिक संस्थान आधुनिक मन के लिए प्रवचनों और प्रकाशनों के माध्यम से "धर्मी" मूल्य
प्रणाली को साझा करने के लिए एक मंच या मंच प्रदान करने में उपयोगी होते हैं। यह समाज को
सामूहिक रूप से सही मूल्य प्रणाली को विकसित करने, साझा करने और अभ्यास करने में मदद
करता है। यह बदले में समाज के उत्थान और सुधार में और अनिवार्य रूप से चरित्र और राष्ट्र
निर्माण के प्रयासों में मदद करता है। सभी धर्म व्यक्ति को अच्छे कर्म करने, दूसरों की देखभाल
करने और सही या नैतिक कार्य करने का आदेश देते हैं। हमारी एक लंबी परंपरा रही है जहां भारत में
व्यक्ति और उद्योग "समाज की देखभाल" को उतना ही प्रोत्साहित करते हैं जितना कि व्यवसाय और
अर्थव्यवस्था के भविष्य के विस्तार के लिए धन का सृजन करना।
इसने स्कूलों और कॉलेजों, अस्पतालों के साथ-साथ विभिन्न धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों के निर्माण
और विकास जैसे विभिन्न रूपों को धारण किया है, जो निरंतर आधार पर विभिन्न प्रकार की धार्मिक
और कल्याणकारी गतिविधियों का समर्थन करता है। प्रत्येक धर्म अपने दर्शन को बढ़ावा देता है और
इसका सार हमेशा लोगों का कल्याण और कल्याण रहा है। उदाहरण के लिए, सनातन धर्म में,
वसुधैव कुटुम्बकम (पूरी दुनिया एक परिवार है), सर्वे सुखिनः भवन्तु (सभी को खुश रहने दें) जैसे
विचार हैं जो समाज में प्रेम और करुणा का पोषण और विकास करते हैं।
शिक्षा अपने उद्देश्यों, पाठ्यक्रम और विधियों में मूल्यों से जुड़ी हुई है। यह शिक्षा के माध्यम से है
कि समाज अपने पोषक मूल्यों को संरक्षित और बढ़ावा देना चाहता है। जो कुछ भी सीखा और
आत्मसात किया जाता है वह यह निर्धारित करेगा कि छात्र भविष्य में अपना जीवन कैसे व्यतीत
करेंगे। शैक्षिक संस्थान एक संरचित वातावरण प्रदान करते हैं जहां बच्चे सहयोग, कड़ी मेहनत, समय
की पाबंदी, प्रतिबद्धता, ईमानदारी, साझाकरण, देखभाल, निष्पक्षता, मदद, स्वतंत्रता, जिम्मेदारी,
विनम्रता, गर्व के मूल्यों को एक बच्चे में विकसित करने की आवश्यकता सीखते हैं।

ईमानदारी का पाठ, सामाजिक न्याय, बच्चों को समाज के कमजोर वर्गों के प्रति सहानुभूति के साथ
संवेदनशील बनाना। लैंगिक समानता, बड़ों के प्रति सम्मान, सच्चाई, सहिष्णुता, शांति, प्रकृति और
मानव जाति के लिए प्रेम, सकारात्मक दृष्टिकोण, आध्यात्मिकता, राष्ट्रवादी भावनाओं, देशभक्ति,
अनुशासन की शिक्षा देने कई सार्वभौमिक मानवीय मूल्य जैसे सत्य, धार्मिक आचरण, शांति, प्रेम और
अहिंसा साधक मानव व्यक्तित्व के शारीरिक, बौद्धिक, भावनात्मक मानस और आध्यात्मिक पहलुओं
से जुड़े हैं। ये सीधे स्कूलों और धार्मिक संस्थानों से प्रभावित हैं। बेहतर और मानवीय समाज के लिए
इन मूल्यों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता और तात्कालिकता है।

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