घरेलू कला से अपनी पहचान बनाती विभा

घरेलू  कला से अपनी पहचान बनाती विभा | Vibha makes her identity with domestic  art | घरेलू कला से अपनी पहचान बनाती विभा

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता ) 

उद्यमिता अर्थात नए संगठन की शुरुआत, नए विचारों की शुरुआत. यह शुरुआत अगर पुरानी चीजों
या कला को लेकर की गई हो तो स्थायित्व थोड़ा मुश्किल हो जाता है. लेकिन फिर भी नामुमकिन
नहीं है. दरअसल हमारे देश में कई ऐसी प्राचीन कलाएं रही हैं, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत
को पहचान दिलाई है. विशेषकर हाथ से बने सामानों के लिए भारत पूरी दुनिया में जाना जाता था.
लेकिन बढ़ते औद्योगिकीकरण और नवीन तकनीक ने इन कलाओं के महत्त्व को कम कर दिया है.
इसके बावजूद देश में आज भी कुछ ऐसे लोग हैं जिन्होंने न केवल इस कला को ज़िंदा रखा है बल्कि
इसे रोज़गार का माध्यम भी बनाया है. विभा श्रीवास्तव ऐसे ही एक रचनात्मक कलाकार है जिन्होंने
क्रोशिया घरेलू कला के माध्यम से न केवल उद्यमिता के क्षेत्र में ख़ुद को स्थापित किया बल्कि
विलुप्त होती इस कला को पहचान भी दिलाई.
एक समय था जब क्रोशिया (कुरुशिया) से बनाए सामान लगभग हर घर में देखने को मिलते थे
लेकिन मशीनों के बढ़ते चलन से रेडीमेड चीज़ों को बढ़ावा मिला और हस्तशिल्प उद्योग में मंदी आ
गई. 90 के दशक के बाद से क्रोशिया चलाने वाले लोगों की संख्या घटने लगी और वर्तमान में यह
सिमट कर कर दादी नानी के बक्से तक रह गई. लेकिन इस मशीनी युग में क्रोशिया इतना भी

पुराना नहीं हुआ कि लोग इसे पहचान ना पाएं. विलुप्ति के कगार पर खड़ी इस कला को आकर्षक
रूप देकर उद्योग के रूप में स्थापित कर रही हैं बिहार के छपरा की रहने वाली विभा श्रीवास्तव. वह
सारण बुटीक की एक इकाई 'हस्त सृजन' की संस्थापिका हैं और कई सालों से क्रोशिया का काम कर
रही हैं. 80 के दशक में अपनी मां से क्रोशिया चलाने की कला शौकिया तौर पर सीखने वाली विभा
आज अपने शहर के लिए क्रोचेट क्वीन बन चुकी हैं. वह एल्यूमीनियम के तार पर हुक बनाकर
क्रोशिया चलाना सीखी थीं. बीते दिनों को याद कर वह कहती हैं "उस समय किशोरियां बिजली के
एलुमिनियम के तार को घिसकर उसका काटा बनाती थीं और उस पर बुनाई सीखा करती थीं. मैं
सोची जब इसका काटा बन सकता तो क्रुश क्यों नहीं? फिर एल्यूमीनियम तार का गला काट कर उस
पर नख बनाकर मैं बुनना शुरू की.
उन्होंने बताया कि जब वह सातवीं या आठवीं क्लास में थी, तो थोड़ा बहुत कढ़ाई बुनाई कर लेती थीं.
दसवीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना होता था, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति इतनी
अच्छी नहीं थी कि पिता सभी बच्चों की पढ़ाई का खर्च वहन कर सकें. इसलिए पढ़ाई छोड़कर मैं
क्रोशिया के काम में लग गई. सारा दिन घर में टाइम मिलता था, इसलिए कुछ ज्यादा ही बुनाई
करने लगी. मेरी बुनाई की चर्चा पूरे गांव में होने लगी. लोग मुझसे बुनाई करवाने के लिए आने लगे
और मैं बुनाई करके बेडशीट, शॉल जो जैसा बोलता था वैसा बनाकर उसको गिफ्ट करती थी."
लेकिन शादी के बाद वह लगभग 20 साल तक अपने हुनर से दूर परिवार में लग गईं. जब परिवार
पटना शिफ्ट हुआ तो उनके जुनून ने घर में रहने वाली इस विभा को एक एंटरप्रेन्योर बना दिया. वह
क्रोशिया से सुंदर सुंदर फ्रॉक, टोपी, मोजा, जैकेट, टेबल क्लॉथ, खिलौने, तोरण, राखी, टीकोस्टर,
तरह तरह के आभूषण व कैरीकेचर बनाने लगीं.
विभा बताती हैं कि उनके संघर्ष व सफलता की कहानी 'डीडी बिहार' चैनल पर प्रसारित होने वाले एक
कार्यक्रम 'फुर्सत घर' से शुरू होती है. इस कार्यक्रम में बिहार महिला उद्योग संघ की अध्यक्ष उषा झा
मेहमान बनकर आई थीं. उषा झा बिहार की जानी मानी महिला उद्यमी हैं और राजधानी पटना में
'पेटल्स क्राफ्ट' नाम से संस्था भी चलाती हैं. जिसमें महिलाओं को मधुबनी पेंटिंग सिखाने के साथ
साथ उन्हें रोजगार से भी जोड़ा जाता है. विभा को भी काम की जरूरत थी. वह कहती हैं, "उषा जी
को टीवी पर देखकर मैं उन्हें खोजने और उनसे मिलने निकल गई. एक रिश्तेदार से उनके मधुबनी
पेंटिंग के शोरूम का पता चला. मैं उनसे मिली और उनकी संस्था से जुड़ने की इच्छा जताई. उन्होंने
कहा कि अगर पेंटिंग करना चाहती हो तो करो,
लेकिन पेंटिंग में मेरी दिलचस्पी नहीं थी. परंतु पैसों की मजबूरी थी तो पेंटिंग सीखा. लेकिन मेरा
दिल इसमें नहीं लगता था. मैंने उनसे कहा कि मुझे क्रोशिया का फ्रॉक वगैरह बनाना आता है तो
उन्होंने कहा कि मेरे लिए एक बना कर लाओ. देखते हैं, कैसा बनाती हो? पहली बार ₹70 का ऊन
खरीद कर उससे एक बेबी फ्रॉक और कैप बनाकर उन्हें दिखाया. वह देखकर बहुत खुश हुईं और कहा
कि बहुत बड़ा हुनर तुम में है. तुम इससे सामान बनाओ और मेरे शोरूम में लेकर रखो. यही से

तुम्हारा सेल ऑर्डर शुरू होगा. विभा बताती हैं कि मेरे काम से खुश होकर उषा जी ने मुझे ₹250
दिए. यह मेरी पहली कमाई थी. मैंने तुरंत जाकर उन पैसों का ऊन खरीदा और उससे 5-6 फ्रॉक
बनाए और यहीं से शुरू कर दिया अपना बिजनेस।"
मात्र 250 रुपए के निवेश से अपना काम शुरू करने वाली विभा वर्तमान में सालाना दो से ढाई लाख
रुपए तक कमा लेती हैं. उन्होंने ख़ुद को उद्योग जगत में ऐसा स्थापित किया कि जिस डीडी बिहार
के कार्यक्रम 'फुर्सत घर' से प्रेरणा लेकर वह इस पथ पर चली थी 2016 में उसी कार्यक्रम में बतौर
गेस्ट आमंत्रित की गईं. विभा ने अपने बिजनेस की शुरुआत जाड़े के कपड़ों से की थी. उन्हें स्वेटर,
जैकेट, बच्चों के फ्रॉक, टोपी, मोजा आदि बनाने के ऑर्डर आते थे और ये कपड़े छपरा, पटना तथा
आस पास के क्षेत्र में अच्छे भाव में बिकने लगे थे. लेकिन उनके सामने मुश्किल यह थी कि उन्हें
इन कपड़ो के ऑर्डर सिर्फ़ सर्दी के मौसम में मिलते थे. गर्मी के दिनों में उन्हें खाली बैठना पड़ता था,
कोई आमदनी नहीं होती थी. इसलिए उन्होंने अपने कारोबार के विस्तार के लिए क्रोशिया से आभूषण
बनाने की भी शुरुआत की. वह क्रोशिया से कान के झुमके, गले का हार, मांग टीका, मेहंदी छल्ला
और अलग अलग आभूषण बनाने लगी. अब उनके बनाये सामान सभी मौसमों में, विशेषकर शादियों
में काफी बिकने लगे.
जैसे जैसे विभा ने अपने कारोबार का विस्तार किया, उन्हें टीम की आवश्यकता पड़ी. इसलिए उन्होंने
पटना और उसके आसपास के गांवों की महिलाओं साथ जोड़कर मुफ़्त प्रशिक्षण देना भी शुरू कर
दिया. इसका उद्देश्य उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रेरित करना था. इस संदर्भ में वह कहती हैं, "शहर
की औरतें जीविकोपार्जन के लिए कुछ ना कुछ कर लेती है परंतु गांव की औरतों को आत्मनिर्भर
बनाना ज्यादा ज़रूरी है।" फिलहाल उनकी टीम में 33 महिलाएं हैं जो संस्था से जुड़ कर काम कर
रही हैं. इस टीम में काम करने वाली शालिनी कहती हैं, "पहले थोड़ा-थोड़ा कढ़ाई बुनाई करते थे. जब
विभा जी से मिले, हम भी उनके साथ काम करना शुरू कर दिए. घर का सारा काम करके जो समय
बचता है उसमें हम यह काम करते हैं. इससे महीने के चार से पांच हजार रुपए तक मिल जाते हैं.
विभा कहती हैं, "फैशन शो में भी मेरी बनाए ज्वेलरी का डिमांड है. एक तो लाइट वेट है, दूसरा इसे
धोकर आसानी से दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है और इसमें शाइनिंग भी रहती है. शादी विवाह
के मौके पर भी जड़ी से बुने हुए ज्वेलरी का आर्डर आता है. इसका ऑर्डर हम समय से 1 महीने
पहले का लेते हैं." आज के समय में विभा और उनकी टीम के पास मौसम और त्योहार के अनुसार
काम रहता है. ठंड के मौसम में वूलन कपड़ों का, लगन के समय दुल्हन के लिए आभूषण का, राखी
के समय राखियों का और राष्ट्रीय त्योहार पर तिरंगे से बुने आभूषणों का. खिलौने, गुड़िया और
जानवर पूरे साल बनाए जाते हैं. इन प्रोडक्ट्स की वीडियो क्लिप बनाकर सैंपलिंग की जाती और
अलग अलग शहर के खरीदारों को भेज दिया जाता है. वर्तमान में हस्त सृजन के प्रोडक्ट्स दिल्ली,
मुंबई, अहमदाबाद, पुणे, बेंगलुरु और विदेशों में अमेरिका व कनाडा जाते हैं. यह टीम बिहार
म्यूजियम के लिए भी प्रोडक्ट्स तैयार करती है.

विभा बताती हैं कि मेरे बिजनेस को कामयाब बनाने में परिवार के साथ साथ उषा जी का भी बहुत
बड़ा योगदान है. वह जब भी विदेश जाती, मेरे बनाए कपड़े या आभूषण अपने साथ लेकर जाती. इस
तरह अमेरिका और कनाडा से भी मुझे ऑर्डर आने लगे." इस संबंध में उषा झा कहती हैं, "विभा
बहुत एंटरप्राइजिंग है. वह न केवल स्वयं आगे बढ़ना जानती हैं बल्कि अपने साथ कई महिलाओं को
जोड़कर उन्हें भी रोज़गार दे रही हैं. वहीं उनके बड़े बेटे विपुल शरण श्रीवास्तव कहते हैं कि समय
समय पर परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाना, बुरे समय मे संघर्ष करना और दूर दिखायी दे रहे किसी
बहुत ही मुश्किल लक्ष्य को भेदने की कला हमने मां से सीखी है. अपनी कड़ी मेहनत और लगन से
उन्होंने अपने शौक को एक कामयाब बिज़नेस का रूप दे दिया है. परिणाम यह है की अब वह एक
सफल उद्यमी के रूप में सबके सामने हैं."
छपरा के छोटे से गांव में पली-बढ़ी विभा श्रीवास्तव ने कोई उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं की है और ना ही
किसी बिजनेस स्कूल से कोई डिग्री ली है. फिर भी वह आज इस मुकाम पर हैं जहां अपने हुनर से
लोगों के बीच अपनी पहचान बना ली हैं. वह पढ़ने के लिए तो कभी कॉलेज नहीं जा सकी, लेकिन
आज पटना के कई फैशन डिजाइनिंग संस्थाएं उन्हें प्रशिक्षक के रूप में आमंत्रित करती हैं. उनकी
सफलता इस बात का संकेत है कि यदि इंसान में जिज्ञासा और जुनून होगा तो मंज़िल कभी दूर नहीं
हो सकती है.

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