भारत-बांग्लादेशः शेख हसीना से बढ़ी उम्मीदें

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भारत-बांग्लादेशः शेख हसीना से बढ़ी उम्मीदें

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता)

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना का शुक्रिया कि उन्होंने अपना वादा निभाया और इस बार की
दुर्गापूजा में कट्टरपंथियों की वहां के किसी पूजा पंडाल में विघ्न पैदा करने की हिम्मत नहीं हुई।
दुर्गापूजा से पहले अपनी भारत यात्रा के दौरान हसीना ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वादा किया था कि
इस बार पूजा में वह पिछली बार जैसी ध्वंस लीला दोहराने नहीं देंगी। पिछले साल दुर्गापूजा पर वहां
कम से कम 1,650 हिंदुओं के घर फूंके गए, 343 हिंदू मंदिर तोड़े गए या उनमें आग लगा दी गई,
14 से अधिक हिंदुओं की हत्याएं हुईं, 26 हिंदू महिलाओं से बलात्कार हुआ और सैकड़ों लोग गंभीर
रूप से घायल हुए थे।
बांग्लादेश में इस बार पिछली बार से ज्यादा 32,168 जगहों पर दुर्गापूजा का आयोजन किया गया
था। हालांकि बांग्लादेश की सरकार ने बंगाल की ममता सरकार की तरह दुर्गापूजा के आयोजकों को
किसी प्रकार का अनुदान नहीं दिया था। इंटरनेशनल हिंदू वॉयस आफ बांग्लादेश के अध्यक्ष हाराधन
देव का कहना है कि शेख हसीना ने इस बार तहेदिल से चाहा, तभी दंगे नहीं हुए। पिछली बार भी
सरकार ने पूजा पंडालों पर पुलिस की तैनाती की थी, पर जैसे ही दंगाई आए, ज्यादातर जगहों पर
पुलिस निष्क्रिय हो गई। लेकिन इस बार हर इलाके के सांसद, विधायक और निकाय प्रमुखों को
सरकार ने कड़ी चेतावनी दी थी। बांग्लादेश जातीय हिंदू महाजोट के महासचिव व प्रवक्ता गोविंद चंद्र
प्रामाणिक कहते हैं कि चूंकि 2024 में शेख हसीना को आम चुनाव का सामना करना है, इस कारण
भी वह पिछले साल की बदनामी के दाग धोना चाहती थीं।
बांग्लादेश में सत्ता-विरोधी हवा की भी सुगबुगाहट है। अगर ऐसे में, भारतीय प्रधानमंत्री को दिया गया
वचन टूटता, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश की बदनामी होती और मानवाधिकार संगठनों को
बोलने का मौका मिलता। बांग्लादेश में लगभग आठ प्रतिशत हिंदू हैं और इनका पूरा वोट हसीना की
पार्टी को ही जाता है। बांग्लादेश की पांच संसदीय सीटों-मोकेसपुर-काशियानी, गोपालगंज-काशियानी,

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तुंगीपाड़ा-कोटालीपाड़ा, मोल्लारहाट-फकीरहाट, बैठाघाट-डकोप पर हसीना उनके परिवार व करीबी नेता
चुनाव लड़ने के इच्छुक होते हैं, क्योंकि इन सीटों पर 65 प्रतिशत वोट हिंदुओं के हैं। बांग्लादेश
नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की नेता खालिदा जिया शेख हसीना की हत्या का षड्यंत्र रचने के आरोप
में जेल में बंद थीं, मगर अभी जमानत पर हैं। कई असाध्य रोगों से जूझने के कारण उन्होंने अपने
बेटे तारिक रहमान को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। अगले चुनाव में जीत के लिए बीएनपी
विगत 22 अगस्त से दो महीनों तक देशव्यापी विरोध रैलियां निकाल रही है। इस दौरान
नारायणगंज, भोला और मुंशीगंज में पार्टी के चार नेता और कार्यकर्ता मारे गए, हजारों कार्यकर्ताओं
पर हमला किया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया। विगत 10 सितंबर से बीएनपी केवल
राजधानी ढाका में रैलियां आयोजित कर रही है।
यहां भी बीएनपी नेता और अवामी लीग के कार्यकर्ता आपस में भिड़े। 16 जगहों पर रैलियों का
कार्यक्रम तेजगांव रैली के साथ खत्म होना था, लेकिन इसे एक अक्तूूबर तक बढ़ाया गया। तारिक
रहमान ज्यादातर समय लंदन में रहते हैं, इसलिए पार्टी के महासचिव मिर्जा फखरूल इस्लाम
आलमगीर ने इन रैलियों की अगुवाई की। बीएनपी नेता चाहते हैं कि चुनाव से पहले एक निरपेक्ष
सरकार गठित की जाए और उसी की देखरेख में चुनाव कराए जाएं। वे हसीना सरकार पर चुनावों में
धांधली का आरोप लगाते रहे हैं। वर्ष 2008 के चुनाव में बुरी तरह पराजित होने के बाद 2014 में
बीएनपी ने आम चुनाव का बहिष्कार किया था। देश के ज्यादातर कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन खालिदा
के खेमे में हैं, ऐसे में, शेख हसीना को संतुलन साधकर चलना पड़ता है। दूसरी तरफ, शेख हसीना से
यह उम्मीद है कि वह केवल पूजा के दौरान नहीं, बल्कि हिंदुओं पर साल भर होने वाले अत्याचार को
रोकेंगी और अपने देश से कट्टरपंथ के दानव के विसर्जन का प्रयास जारी रखेंगी।

 

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