भुखमरी की सूची में भारत 107वें नंबर पर

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भुखमरी में भारत की हालत पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी बदतर, 121  देशों की लिस्ट में मिली 107वीं रैंक- Hum Samvet

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता)

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वैश्विक भुखमरी सूचकांक हंगर इंडेक्स में भारत की स्थिति पूर्व की तुलना में और ख़राब हो गई है।
सूची में 6 अंक और नीचे भारत आ गया है। हंगर सूची के इंडेक्स में पहले 101 में स्थान पर भारत
था। अब 107वें स्थान पर आ गया है। अफगानिस्तान दक्षिण एशिया का एकमात्र देश है, जो भारत
के पीछे है। अफगानिस्तान का नाम 109वें नंबर पर है। इस सूची में पाकिस्तान 99, श्रीलंका 64
बांग्लादेश 84 नेपाल 81 और म्यामार 71वें स्थान पर है।
वैश्विक भूख सूचकांक के आंकड़े में भारत दुनिया में पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के पीछे
चला गया है। रिपोर्ट को पढ़ने पर यह अजीब लगता है, लेकिन वास्तविक स्थिति यही है। पिछले
वर्षों में योजनाओं का बड़े पैमाने पर प्रचार प्रसार होता है, लेकिन इसकी जमीनी हकीकत ठीक इसके
विपरीत होती है। कागजों पर ही योजनाओं का क्रियान्वयन हो जाता है। करोड़ों अरबों रुपए का
भ्रष्टाचार हो रहा है। सरकारी गोदामों से 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज पहुंचाने का बड़ा-बड़ा दावा
किया जाता है। लेकिन हकीकत में ऐसा होता नहीं है। सरकार कागजों पर बहुत अच्छी योजनाएं
बनाती है। लेकिन जमीनी स्तर पर यह योजनाएं आज भी नहीं पहुंच पा रही हैं। जिसके कारण
बिचौलिए भारी भ्रष्टाचार करते हुए योजनाओं में पलीता लगा रहे हैं। सरकारी गोदामों से जो अनाज
निकला, वह बड़े पैमाने पर रास्ते में ही कालाबाजारी करके बेच दिया जाता है। सरकारी गोदामों का
अनाज अब निर्यात करके बाहर भी भेजा जा रहा है। सत्तारूढ़ दल के लोग ही इस कार्य में लगे होते
हैं। कागजों पर तो अनाज बांट देते हैं। लेकिन यह आम आदमी तक पहुंच नहीं पाता है।
विपक्षी दलों ने सरकार के ऊपर भुखमरी को लेकर हमला बोला है। भारत में भुखमरी बढ़ रही है।
लेकिन पिछले इतने सालों में इस व्यवस्था में सुधार लाने के लिए विपक्षी दलों ने सरकार के ऊपर

ऐसा कोई दबाव नहीं बनाया है। जिसके कारण भुखमरी से लोगों को बचाया जा सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी जो एक चाय वाले के बेटे हैं। उन्होंने खुद भी चाय बेची हैं। उन्हें गरीबी एवं भुखमरी का
एहसास है। उनकी संवेदनशीलता कहां है। जब दो वक्त की रोटी भी आम आदमी तक नहीं पहुंच पा
रही है। सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है, कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार जैसे देशों के पीछे
आकर भारत खड़ा हो गया है। यह भारत के लिए चिंताजनक है।
भूख, बगावत को जन्म देती है। जिस तरीके से पिछले वर्षों में महंगाई बेरोजगारी और अब अनाज
का संकट आम आदमी तक बड़ी तेजी के साथ फैल रहा है। भारत सरकार विदेशी मुद्रा को प्राप्त
करने के लिए बड़ी मात्रा में खाद्यान्न का निर्यात भी कर रही है। हाल ही में सरकार ने आटा और
टूटे चावल के निर्यात पर लगी रोक हटा ली है। सरकारी गोदामों में पिछले वर्षों की तुलना में बहुत
कम भंडारण हैं। सरकार अभी भी वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज करते हुए भगवान के भरोसे, यह
मानकर चल रही है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत बांटने के लिए उसके पास पर्याप्त मात्रा
में खाद्यान्न हैं। खुले बाजार में खाद्यान्न के रेट लगातार बढ़ते जा रहे हैं। सार्वजनिक वितरण
प्रणाली का गेहूं चावल और अन्य खाद्यान्न जरूरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है। इसमें भारी
भ्रष्टाचार हो रहा है। यदि सरकार समय रहते स्थितियों में सुधार नहीं कर पाती है। फिर स्थिति को
नियंत्रण में रख पाना काफी मुश्किल होगा। यहां यह भी सोचना होगा कि श्रीलंका और पाकिस्तान
जैसे भुखमरी की सूची में भारत 107 वें नंबर पर वैश्विक भुखमरी सूचकांक हंगर इंडेक्स में भारत
की स्थिति पूर्व की तुलना में और ख़राब हो गई है। सूची में 6 अंक और नीचे भारत आ गया है।
हंगर सूची के इंडेक्स में पहले 101 में स्थान पर भारत था। अब 107 वें स्थान पर आ गया है।
अफगानिस्तान दक्षिण एशिया का एकमात्र देश है। जो भारत के पीछे है। अफगानिस्तान का नाम
109 वें नंबर पर है। इस सूची में पाकिस्तान 99, श्रीलंका 64, बांग्लादेश 84, नेपाल 81 और
म्यामार 71वें स्थान पर है।
वैश्विक भूख सूचकांक के आंकड़े में भारत दुनिया में पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के पीछे
चला गया है। रिपोर्ट को पढ़ने पर यह अजीब लगता है। लेकिन वास्तविक स्थिति यही है। पिछले
वर्षों में योजनाओं का बड़े पैमाने पर प्रचार प्रसार होता है। लेकिन इसकी जमीनी हकीकत ठीक इसके
विपरीत होती हैं। सरकारी खाद्यान्न से 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज पहुंचाने का बड़ा-बड़ा दावा
किया जाता है लेकिन हकीकत में ऐसा होता नहीं है। भारत में सरकार कागजों पर बहुत अच्छी
योजनाएं बनाती है लेकिन जमीनी स्तर पर यह योजनाएं आज भी नहीं पहुंच पा रही हैं, जिसके
कारण बिचौलिए बनकर योजनाओं में पलीता लगाया जा रहा है। सरकारी गोदामों से जो अनाज
निकला वह बड़े पैमाने पर रास्ते में ही कालाबाजारी करके बेच दिया जाता है। सत्तारूढ़ दल के लोग
ही इस कार्य में लगे होते हैं। वहीं बड़े पैमाने पर कालाबाजारी करके कागजों पर तो अनाज बांट देते हैं
लेकिन यह आम आदमी तक पहुंच नहीं पाता है।
विपक्षी दलों ने सरकार के ऊपर हमला किया है कि भारत में भुखमरी बढ़ रही है, लेकिन पिछले
इतने सालों में इस व्यवस्था में सुधार लाने के लिए विपक्षी दलों ने सरकार के ऊपर ऐसा कोई दबाव

नहीं बनाया है, जिसके कारण भुखमरी से लोगों को बचाया जा सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो एक
चाय वाले के बेटे हैं, उन्होंने खुद भी चाय बेची हैं। उन्हें गरीबी का एहसास है, लेकिन उनकी
संवेदनशीलता कहां है। जब दो वक्त की रोटी भी आम आदमी तक नहीं पहुंच पा रही है। सबसे बड़े
आश्चर्य की बात तो यह है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार जैसे देशों के पीछे आकर हम खड़े हो
गए हैं। यह भारत के लिए चिंताजनक स्थिति है।
भूख बगावत को जन्म देती है जिस तरीके से पिछले वर्षों में महंगाई बेरोजगारी और अब अनाज का
संकट आम आदमी तक बड़ी तेजी के साथ फैल रहा है। भारत सरकार विदेशी मुद्रा को प्राप्त करने के
लिए बड़ी मात्रा में खाद्यान्न को निर्यात भी कर रही है। हाल ही में सरकार ने आटा और टूटे चावल
के निर्यात पर लगी रोक हटा ली है। सरकारी गोदामों में पिछले वर्षों की तुलना में बहुत कम भंडारण
हैं। सरकार अभी भी वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज करते हुए भगवान के भरोसे यह मानकर चल
रही है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत बांटने के लिए उसके पास पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न
हैं। खुले बाजार के रेट लगातार बढ़ते जा रहे हैं सार्वजनिक वितरण प्रणाली का गेहूं चावल और अन्य
खाद्यान्न जरूरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है इसमें भारी भ्रष्टाचार हो रहा है। इसके बाद भी
यदि सरकार समय रहते स्थितियों में सुधार नहीं कर पाती है तो फिर स्थिति को नियंत्रण में रख
पाना काफी मुश्किल होगा। यहां यह भी सोचना होगा, कि श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देश जब
हमसे बेहतर स्थिति में हैं। उसके बाद भी वहां पर सरकारों के खिलाफ जनमत सड़कों पर आकर
अपना विरोध जता रहा है। यदि यही स्थिति रही, तो जल्द ही भारत की भी स्थिति बहुत विस्फोटक
हो सकती है। जो देश हमसे बेहतर स्थिति में हैं। उसके बाद भी वहां पर सरकारों के खिलाफ जनमत
सड़कों पर आकर अपना विरोध जता रहा है। यदि यही स्थिति भारत की बनी रही, तो जल्द ही
भारत को विभिन्न स्तरों पर कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

 

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