सुप्रीम कोर्ट ने साईंबाबा की रिहाई रोकी, जेल में बंद रहेंगे

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DU के पूर्व प्रोफेसर साईबाबा की रिहाई पर क्यों लगी 'सुप्रीम रोक'? समझें  फैसले की

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता)

दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा, को मुंबई हाईकोर्ट द्वारा माओवादियों से
संबंध मामले में शुक्रवार को बरी किया गया। मुंबई हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार
की एजेंसी एनआईए ने जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट में जाकर आधी-अधूरी याचिका दायर की। सुप्रीम
कोर्ट ने एनआईए की याचिका की सुनवाई छुट्टी के दिन शनिवार को विशेष अदालत से कराने का
निर्णय लिया। इस प्रक्रिया से सरकार, राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए और न्यायपालिका की लोकतंत्र
के प्रति आस्था एवं निष्ठा को लेकर प्रश्नचिन्ह लगना शुरू हो गया है।
मुंबई हाई कोर्ट ने शारीरिक रूप से 90 फीसदी विकलांग प्रोफेसर साईं बाबा को जिन्हें 2014 में
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली मामले में गिरफ्तार किया गया था। 2017 में गढ़चिरोली की अदालत ने उन्हें
उम्र कैद की सजा सुनाई थी। 2014 से वह लगातार नागपुर की केंद्रीय जेल में बंद हैं। वह
आदिवासियों और जनजातियों के लिए आवाज उठाते रहे हैं। उन्हें सोशल एक्टिविस्ट के रूप में सारी
दुनिया जानती है। इस मामले में कई बार उनकी ओर से जमानत के आवेदन लगाए गए। जो
लगातार खारिज होते चले गए। इस मामले में गढ़चिरौली की अदालत में सुनाई गई सजा के खिलाफ
मुंबई हाई कोर्ट में अपील की गई थी। मुंबई हाई कोर्ट ने शुक्रवार को पूर्व प्रोफेसर साईं बाबा और 5
अन्य आरोपियों को कोई सबूत नहीं होने के कारण निर्दोष करार दिया और उन्हें जेल से छोड़ने के
आदेश दिए थे।
बॉम्बे हाई कोर्ट का आदेश हुआ, उसके कुछ घंटों के बाद ही सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सुप्रीम
कोर्ट पहुंच गए। जहां पर उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश पर तत्काल रोक लगाने के लिए सुनवाई
करने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की याचिका
पर शनिवार की सुबह 11 बजे न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी को सुनवाई
करने के लिए अधिकृत किया।
यह एक ऐसा मामला है जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा और सुना जा रहा है।
न्यायालयीन प्रक्रिया को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चाएं हो रही हैं। पूर्व प्रोफेसर साईं बाबा की
जिस तरीके की हालत है उस हालत में गंभीर से गंभीर मामले के अपराधी को जमानत और पैरोल
मिल जाती है। लेकिन विचारधारा के आधार पर जेल में बंद आरोपी साईं बाबा जिनके खिलाफ
एनआईए कोई सबूत नहीं जुटा सकी। पिछले 8 साल की कानूनी प्रक्रिया के बाद उनको हाईकोर्ट से
राहत मिली। इसके तुरंत बाद न्यायिक प्रक्रिया का पालन किए बिना सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए
दबाव बनाकर सुनवाई की मांग की गई। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मांग मान लिए जाने से सारे देश एवं
दुनिया में यह संदेश जा रहा है, कि भारतीय न्यायपालिका सरकार के दबाव में काम कर रही है। यह
स्थिति ना तो सरकार के लिए अच्छी है ना ही न्यायपालिका के लिए अच्छी मानी जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले की सुनवाई करते हुए मुंबई हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है।
अगली सुनवाई के लिए 8 नवंबर की तारीख तय कर दी है।
इस केस में एक आरोपी की जेल के अंदर ही मौत हो चुकी है। साईं बाबा 90 फ़ीसदी विकलांग है।
वह अपने खुद के जरूरी काम नहीं कर पाते हैं। ट्रायल कोर्ट में पूरी सुनवाई के बाद हाई कोर्ट में यह
मामला कई वर्षों तक लंबित रहा। जब न्याय मिला, उसके बाद भी साईं बाबा जेल से बाहर नहीं
निकल पाए। रिहाई के पहले ही सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी बांबे हाईकोर्ट के
आदेश पर तुरंत रोक लगा दी। बाबा राम रहीम जैसे अपराधी को जेल से पैरोल मिल जाती है लेकिन
पिछले 8 वर्षों में एक प्रोफेसर को जिस तरीके से विचारधारा के नाम पर प्रताड़ित किया जा रहा है
उससे देश एवं दुनिया में भारतीय न्यायपालिका की साख खत्म होती जा रही है।

 

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