‘आप’ का समाज विरोधी आचरण

Advertisement

आप' का समाज विरोधी आचरण | Anti-social behavior of 'AAP'

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता)

पिछले दिनों दिल्ली में एक कार्यक्रम हुआ जिसमें दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेता और मंत्री
राजेन्द्र पाल गौतम प्रमुख भूमिका में रहे। कहा जाता है इस सम्मेलन में लगभग दस हज़ार लोग
हाजिऱ थे। वैसे यह अपने आप में कोई ख़बर नहीं है। आम आदमी पार्टी एक राजनीतिक दल है।
उसके कार्यकर्ता और और नेता स्वयं भी इस प्रकार के कार्यक्रम करवाते रहते हैं और दूसरों द्वारा
करवाए गए ऐसे कार्यक्रमों में शिरकत भी कहते रहते हैं। लेकिन ख़बर इससे आगे शुरू होती है। इस
कार्यक्रम में आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता राजेन्द्र पाल गौतम ने कार्यक्रम में उपस्थित दस हजार
लोगों को बाईस शपथें दिलवाईं। अनेक देवी-देवताओं का नाम लेकर यह शपथ दिलवाई गई कि मैं
अब इनमें आस्था नहीं रखूंगा और न ही इनकी पूजा करूंगा। आम आदमी पार्टी का इस सबके पीछे
क्या एजेंडा छिपा हुआ है, यह तो अरविंद केजरीवाल ही बेहतर जानते होंगे, लेकिन उसकी इस
गतिविधि से देश भर में तहलका मच गया और पार्टी के वरिष्ठ नेता आम भारतीय के फोकस में आ
गए। लेकिन राजेन्द्र पाल गौतम ने जो चक्रव्यूह रचना की, उससे आम आदमी पार्टी का बाहर
निकलना मुश्किल हो गया। तब आम आदमी पार्टी ने इस भंवर से निकलने के लिए बाबा साहिब
भीमराव आम्बेडकर को ढाल की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। राजेन्द्र पाल गौतम तुरन्त
स्पष्टीकरण देने की भूमिका में उतर आया। उसने कहा यह तो दशकों पहले बाबा साहिब आम्बेडकर
ने नागपुर में किया था। उन्होंने यही शपथ स्वयं भी ली थी और सार्वजनिक रूप से वहां उपस्थित
अपने साथियों को भी दिलाई थी। गौतम या आम आदमी पार्टी जिस सन्दर्भ का उल्लेख कर रही है,
वह नागपुर में दीक्षा भूमि का है।
वहां विजय दशमी के दिन आम्बेडकर ने तथागत बुद्ध के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया था और
एक वयोवृद्ध भिक्षु से इसकी दीक्षा ली थी। लेकिन बाबा साहिब की यह दीक्षा उनकी लम्बी साधना
का परिणाम था। यह दीक्षा प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक लम्बी प्रक्रिया का सुपरिणाम थी। बाबा साहिब
ने अपनी साधना के बल से आग का एक दरिया पार किया था। वे भारतीय समाज में सामाजिक
समरसता के साधक थे। इसके साथ ही वे उच्च कोटि के दार्शनिक थे। वे स्वभाव से आध्यात्मिक
जीवन के यात्री थे। साकार में आस्था उनके जीवन का पहला चरण था। अब वे साधना के उस चरण
पर पहुंच चुके थे जहां उन्हें अपनी साधना के लिए साकार की जरूरत ही नहीं रह गई थी। यही
कारण है कि उन्होंने आध्यात्मिक जीवन यात्रा के दूसरे चरण की दीक्षा ली। यह चरण तथागत बुद्ध
की साधना में से होकर गुजऱता था। वस्तुत: यह चरण आचरण की शुद्धि का ही साधना मार्ग था।
आचरण को उस स्तर तक लेकर जाना जहां से निर्वाण का मार्ग शुरू होता है, किसी गृहस्थ के लिए
यह कठिन साधना है। ब्राह्मण कुल में जन्मी डा. सविता इस प्रयोग में उनकी सहायिका बनी। लेकिन
ध्यान रखना चाहिए आम्बेडकर की यह साधना उनकी राजनीतिक साधना नहीं थी। न ही इसका
उद्देश्य किसी बड़े राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति था। बल्कि यह तो राजनीति से कोसों दूर सामाजिक
व आध्यात्मिक यात्रा का चरण था। आम्बेडकर ने इस दीक्षा के लिए एक साधक जैसे ही काषाय

धारण किए। लेकिन स्पष्ट है कि आम आदमी पार्टी आम्बेडकर की आड़ में सामाजिक समरसता के
स्थान पर अपनी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए सामाजिक विषमता के रास्ते पर चल रही है।
उसके गौतम जो शपथ समारोह कर रहे हैं, वह घृणा और विद्वेष की भावना में से निकला है न कि
किसी आध्यात्मिक साधना का परिणाम है। यह राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए किया गया
नक्सलवादी प्रयोग कहा जा सकता है। आम आदमी पार्टी को आशा रही होगी कि एक विशेष समुदाय
में से उसको राजनीतिक धरातल पर तत्काल लाभ मिलना शुरू हो जाएगा। लेकिन आम आदमी पार्टी
का यह नया पैंतरा नहीं है। उसकी राजनीति की शुरुआत ही इस प्रकार के पैंतरों से हुई है। लम्बा
अरसा नहीं हुआ कि वे सत्ता प्राप्ति की आशा में पंजाब के अलगाववादियों के साथ गुफ़्तगू करते पकड़े
गए थे। कुछ मास पहले तक वह नागरिकता संशोधन अधिनियम के मामले में यही प्रयोग मुसलमानों
को लेकर कर रही थी। दिल्ली के शाहीन बाग़ में भारत के देसी मुसलमानों को आगे करके विदेशी
मूल के अशरफ समाज यानी एटीएम ने जो आंदोलन चलाया था, उसमें बहुत बड़ी भूमिका आम
आदमी पार्टी के विधायकों व पार्षदों की ही थी। पार्टी की उस वक्त भी यही रणनीति थी। इस प्रयोग
से उसके घर विदेशी मूल के अशरफ समाज और पसमांदा यानी भारतीय मूल के डीएम अर्थात देसी
मुसलमान की वोटों की बारिश होने लगेगी। अरविन्द केजरीवाल इतना तो जानते ही हैं कि उनके ये
प्रयोग देश की सामाजिक संरचना में दरारें डालने वाले हो सकते हैं, समरसता के वाहक नहीं।
केजरीवाल अच्छी तरह जानते हैं कि उनके राजेन्द्र पाल के गौतम में और आम्बेडकर के गौतम में
जमीन आसमान का अन्तर है। बाबा साहिब का गौतम उनकी लम्बी आध्यात्मिक साधना में से
निकला था और राजेन्द्र पाल का गौतम उनके ह्रदय के भीतर की घृणा में से निकला है।
लेकिन अपनी राजनीति के लिए केजरीवाल को भी राजेन्द्र पाल के गौतम की तलाश है, बाबा साहिब
के गौतम की नहीं। परन्तु अपने इन क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के लिए बाबा साहिब आम्बेडकर के नाम
की ढाल आगे करके उन्हें आम्बेडकर का अपमान करने का कोई अधिकार नहीं है। शायद केजरीवाल
को भी दिल्ली के इस प्रकरण के तूल पकड़ते-पकड़ते यह अहसास हो गया था कि यह प्रकरण
राजनीतिक लिहाज़ से भी उल्टा पड़ता जा रहा है। यही कारण है कि उन्होंने तुरंत राजेन्द्र पाल गौतम
से इस्तीफा ले लिया। उन्हें मंत्री पद से मुक्त कर दिया। लेकिन अपने इस आचरण से आम आदमी
पार्टी ने जो अपमान बाबा साहिब आम्बेडकर का किया है, केजरीवाल को उसके लिए भारतीय समाज
से क्षमा याचना करनी चाहिए। समाज में नफरत फैला कर कोई संगठन सफलता की सीढिय़ां नहीं
चढ़ सकता। अरविंद केजरीवाल को यह बात समझ लेनी चाहिए।.
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार है)

Leave a Comment

Advertisement
What does "money" mean to you?
  • Add your answer