डालर मुद्रा ने मचाया सारी दुनिया में हाहाकार

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आख़िर डॉलर कैसे बना दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा - BBC News हिंदी

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता)

डॉलर मुद्रा के सामने सभी देशों की मुद्रा का अवमूल्यन हो रहा है। इसका सबसे ज्यादा दबाव जापान
पर देखने को मिला है। जापानी मुद्रा येन को संभालने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर निकालने
पड़े। जिसके कारण 1998 के बाद जापान पहली बार मुद्रा संकट में फस गया। चीन के बाद सबसे
बड़ा विदेशी मुद्रा का भंडार जापान के पास था। उसके बाद भी जापान को अर्थव्यवस्था के संकट का
सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका का डॉलर इंडेक्स नई ऊंचाइयां छूता जा रहा है। पिछले 9 महीने
में 15 फ़ीसदी की वृद्धि हो चुकी है। सभी देशों के विदेशी मुद्रा भंडार में करेंसी को संभालने के लिए
जो डालर खर्च किए गए हैं। उससे सारी दुनिया महंगाई और मंदी की ओर जाती हुई दिख रही है।
महंगाई बढ़ने से ब्याज दरें भी अमेरिका सहित सभी देशों में बढ़ने लगी है। अमेरिकी डॉलर को लेने
के लिए बाजार में मांग बढ़ गई और डालर में भी सट्टेबाजी शुरु हो गई।
50 साल पुरानी स्थिति
पहली बार ऐसा हो रहा है, ऐसा नहीं है 1973 में इजिप्ट और सीरिया के बीच युद्ध हुआ था। उस
समय अमेरिका को इजरायल की मदद मिली। इसके बाद अरब देशों में अमेरिका को तेल का निर्यात
बंद कर दिया था। 1974 में अमेरिका की महंगाई बड़ी तेजी के साथ बढ़ने लगी थी। अमेरिका की
ब्याज दरें 20 फ़ीसदी पर पहुंच गई थी। उसके बाद वही हुआ, जो वर्तमान में हो रहा है। अमेरिकी
डालर ज्यादा मजबूत होने लगा। उस समय भी अमेरिका मंदी और बेरोजगारी का शिकार हो गया था।
तत्कालीन राष्ट्रपति रेगन को डालर मुद्रा का अवमूल्यन करने विवश होना पड़ा था।
1985 का समझौता दशा और दिशा तय करेगा
1985 में जब मुद्रा संकट का हाहाकार मचा हुआ था उस समय यह मार्च में बैठक हुई जिसमें
पश्चिमी जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और अमेरिका के बीच एक समझौता हुआ। G5 के देशों ने
अमेरिका को 50 फ़ीसदी डालर के मूल्य पर अमूल्य करने पर सहमत कर लिया। इस समझौते के
बाद जापान फ्रांस ब्रिटेन और जर्मनी की मुद्रा का मूल्य 50 फीसदी बढ़ गया था। केंद्रीय बैंकों ने मुद्रा
बाजार में सीधा हस्तक्षेप किया। इसके बाद जापान की अर्थव्यवस्था मंदी मंदी का शिकार हो गई थी।
कर्ज संकट का असर 1985 का यह समझौता भी ज्यादा दिन नहीं चल पाया था। 1987 में फ्रांस ने
इस समझौते को रद्द कर दिया G5 के देशों ने विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करना बंद कर दिया।
अमेरिकी मुद्रा की मजबूती से डालर में कर्ज लेने वाले भारी मुसीबत में फंसे थे। फेड रिजर्व के

तत्कालीन चेयरमैन एलन ग्रीनस्पन ने 1990 के पूरे दशक की ब्याज दरें कम की। तब जाकर 1995
में डॉलर इंडेक्स 81 के स्तर पर आया था। उसके बाद मुद्रा बाजार का संकट कम हुआ था।
डॉलर मुद्रा का अवमूल्यन
डॉलर इंडेक्स संतुलित होने पर ही डालर का अस्तित्व बना रहेगा। अन्यथा निर्यात को लेकर सभी
देशों के बीच में मुद्रा का जो संकट आया है। उसको टाला जा सकता है। सारी दुनियां में पिछले 30
वर्षों में काफी विकास हुआ है। डिजिटल लेनदेन बड़े पैमाने पर हो रहें हैं। सभी देश जिन देशों से
व्यापार करते हैं। उनसे उनके हित जुड़े होते हैं। प्रतिबंध लगाने के बाद कई देशों ने व्यापार और
भुगतान के तरीके अपने हिसाव से तय कर लिए। जिसके कारण प्रतिबंध भी बेअसर साबित हुए।
वैश्विक व्यापार संधि के बाद मुक्त व्यापार होने से डालर मुद्रा पर सभी देश डालर पर आश्रित है।
श्रीलंका, पाकिस्तान सहित छोटे एवं विकासशील देश मुद्रा संकट में फंस गये हैं। वैश्विक व्यापार एवं
विदेशी कर्ज की वर्तमान व्यवस्था को बनाये रखना है तो विश्व बैंक को डालर मुद्रा को स्थिर रखने
एवं कर्ज की ब्याज दरों को सीमित रखना होगा। यदि ऐसा समय रहते नहीं हुआ तो सारी दुनिया
आर्थिक संकट में फंसेगी। इसका परिणाम तृतीय विश्व युद्ध के रुप में भी सामने आ सकता है। वहीं
कर्ज की अदायगी भी दिवालिया होने की स्थिति हो सकती है।

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