गरीबों की जान की कीमत

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गरीबी की मजबूरी: 16 साल की बेटी की जान बचाने के लिए 12 साल की बेटी को दूसरे  के हाथों बेच दिया, खरीदने वाले ने जो किया...?..

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

कानपुर में एक भीषण सड़क दुर्घटना में एक ही गांव के 26 लोगों की मौत हो गई। कोरथा गांव के
राजू निषाद नामक व्यक्ति ने अपने एक साल के बेटे का मुंडन उन्नाव के चंद्रिका देवी मंदिर में
करवाया। इस कार्यक्रम के लिए गांव के ही बहुत से लोग और रिश्तेदार एक साथ ट्रैक्टर-ट्राली में
लदकर गए थे। यह ट्राली राजू ने गांव के एक अन्य व्यक्ति से ली थी। मंदिर से लौटते हुए राजू
निषाद और उनके साथ कुछ लोगों ने शराब पी और उसके बाद शराब के नशे में ही राजू ने तेज
रफ्तार में ट्रैक्टर-ट्राली चलाई।
बताया जा रहा है कि राजू को रफ्तार धीमी करने कहा गया था, लेकिन उसने बात नहीं सुनी। रास्ते
में एक बाइक सवार को बचाने में ट्रैक्टर ट्रॉली एक तालाब में पलट गई। ट्रैक्टर ट्रॉली में 50 के क़रीब
लोग सवार थे, जिनमें से 26 लोगों की मौत हो गई और अभी घायलों का इलाज अस्पताल में चल
रहा है। मरने वालों में 13 महिलाएं और 13 बच्चे हैं। और सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि
मृतकों में कोई भी नशे में नहीं रहा होगा। यानी मृतक दूसरों की लापरवाही का शिकार बन गए।
इस भयावह घटना को महज एक और सड़क दुर्घटना की तरह न मानकर इसके विभिन्न पहलुओं का
विश्लेषण किया जाए, और फिर उसमें खामियों को सुधारने की कोशिश की जाए, तो शायद भविष्य
में ऐसे हादसों पर लगाम लग सकेगी। हिंदू धर्म में मुंडन एक संस्कार है, इसलिए इसके कुछ नियम-
कायदे बनाए गए हैं। लेकिन इन नियमों में क्या पुरुषों को यह छूट दी जा सकती है कि इसके बाद
वे शराब पिएं। हमारे समाज में कई तरह के नैतिक मानदंड बनाए गए हैं और महिलाओं पर थोपे भी
गए हैं।
लेकिन पुरुष अक्सर आनंद के नाम पर विवाह, जन्मोत्सव और मुंडन जैसे धार्मिक आयोजनों में
शराब पीते हैं, हुड़दंग मचाते हैं और समाज इन्हें सामान्य घटनाओं की तरह लेता है। कई बार अपनी
खुशी प्रदर्शित करने के लिए बंदूकें भी चलाई जाती हैं। जिसमें कभी कोई हादसा हो जाए, तो उस पर
चर्चा होती है, लेकिन ऐसी प्रवृत्तियों पर लगाम लगे, ऐसी कोशिश नहीं होती। अपने बच्चे के मुंडन के
बाद उसकी खुशी घर आकर परिवार के बाकी सदस्यों के साथ मनाई जा सकती थी, लेकिन इससे

पहले ही शराब ने न केवल एक बल्कि आठ परिवारों के घर मातम पसरा दिया। जिस घर के बच्चे
का मुंडन था, अकेले वहां ही 12 लोग इस हादसे में मारे गए हैं।
इस घटना के बाद मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने अस्पताल जाकर घायलों से मुलाकात की, उनके
इलाज के बारे में जानकारी ली, साथ ही ट्वीट किया कि माल ढोने वाले वाहन जैसे ट्रैक्टर ट्राली और
लोडर का प्रयोग सवारी ले जाने में न किया जाए। जीवन अमूल्य है। कृपया लापरवाही न बरतें।
मुख्यमंत्री की यह अपील बिल्कुल सही है कि ट्रैक्टर ट्राली का उपयोग सवारी ढोने के लिए न किया
जाए। लेकिन क्या इस एक अपील से ऐसा होना रुक जाएगा। उत्तरप्रदेश ही नहीं, भारत के तमाम
राज्यों में माल ढोने वाले वाहनों में इंसानों को ठूंस-ठूंस कर भरकर एक जगह से दूसरी जगह जाते
हुए देखा जा सकता है। क्योंकि गरीबों के लिए सस्ते, सुलभ और सुविधाजनक यात्रा के साधन
सीमित होते जा रहे हैं। सरकारी बसों के परिचालन और रख-रखाव पर बरसों से व्यंग्य लिखे जा रहे
हैं, लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं आता।
ट्रेनों में सफर पहले से महंगा और कठिन हो गया है। कम दूरी की यात्रा के लिए हर थोड़ी देर पर
छोटे वाहन चलाए जा सकते हैं, लेकिन वहां भी ठेकेदारी प्रथा हावी हो चली है। निजी बस सेवाएं
महंगी हैं और कार रखना हर किसी के बस की बात नहीं है। देश के एक-दो प्रतिशित धनाढ्य लोग
निजी विमानों पर उड़ा करते हैं, उच्च वर्ग और उच्च मध्यमवर्ग अपनी सुविधा के मुताबिक कार, बस
या ट्रेन का इंतजाम कर लेता है, लेकिन गरीबों को अगर कभी रोजगार के अलावा किसी और कारण
से दूसरे स्थान जाना पड़े और वो भी परिवार के अन्य लोगों के साथ, तो उन्हें इसी तरह किसी
मालवाहक वाहन में भरकर जाना पड़ता है। अगर सस्ती सार्वजनिक यातायात की सुविधा हो, तो फिर
गरीबों के पास भी विकल्प मौजूद रहेंगे। शहर के भीतर भी एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करना
गरीबों के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। इसलिए आटो, टैम्पो या ई रिक्शा में जरूरत से अधिक सवारी भरे
जाने पर भी वो उसमें सफर करते हैं। इन वाहनों के भी असंतुलित होकर पलटने का डर हमेशा बना
रहता है।
दुर्घटनाएं बोल कर नहीं आती, लेकिन हालात देखकर उनके आगमन के संकेत समझ लेने चाहिए।
कानपुर हादसे से सड़क दुर्घटना के बारे में एक बड़ा सबक मिला है। लेकिन क्या इससे प्रशासन कोई
सीख लेगा, यह देखना होगा। अभी कुछ दिन पहले उद्योगपति साइरस मिस्त्री की सड़क हादसे में
मौत के बाद पीछे की सीटों पर बेल्ट लगाकर बैठने की जोरदार अपीलें हुईं और अब इसे लेकर नियम
भी सख्त कर दिए गए हैं। मगर ट्रेनों, बसों की छतों और ट्रकों, ट्रैक्टर-ट्रालियों में भरे गए लोगों के
लिए बेल्ट का इंतजाम कोई ताकत नहीं कर सकती। इन पर बैठे गरीब लोगों की जान की कीमत
अमीरों की जान जैसी ही है, यह सोच जब विकसित हो जाएगी, तब शायद उनके जीवन में सुविधाओं
का इंतजाम भी किया जाएगा।

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