मुफ्त अनाज से 5-जी तक

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कोरोना काल में गरीबों को मुफ्त राशन मुहैयार कराने के लिए शुरू की गई पीएम  गरीब कल्याण योजना को 6 महीने तक बढ़ाने का फैसला, 30 सितंबर तक मिलेगा ...

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

बीते सप्ताह दो महत्त्वपूर्ण ख़बरें सामने आईं। एक, केंद्रीय कैबिनेट ने 80 करोड़ गरीब लोगों के लिए
मुफ्त अनाज की योजना तीन महीने, 31 दिसंबर, 2022 तक, बढ़ाने का फैसला लिया। दूसरी,
प्रधानमंत्री मोदी ने 5-जी संचार सेवा की शुरुआत का बटन दबाया। फिलहाल यह 13 शहरों में ही
उपलब्ध है। दोनों घटनाओं में साझापन यह है कि भारत आज भी गरीबी, महंगाई, बेरोजग़ारी से त्रस्त
है, लेकिन प्रौद्योगिकी के विकास में नए आसमान छू रहा है। सवाल यह है कि जो भारत हमारे
सामने है, क्या उसके लिए 5-जी बहुत जरूरी है अथवा हम एक अंधी वैश्विक दौड़ में शामिल हैं?
मुफ्त अनाज 2020 में कोरोना की वैश्विक महामारी के मद्देनजर सरकार ने मुहैया कराना शुरू किया
था। जब इस योजना को सितंबर, ’22 तक बढ़ाने का बुनियादी फैसला प्रधानमंत्री ने लिया था, तब
वित्त से जुड़े शीर्ष अधिकारियों और विशेषज्ञों ने आगाह किया था कि अब योजना को समाप्त किया
जाए, नहीं तो इसका अर्थव्यवस्था पर उलटा असर पड़ेगा। करीब 80,000 करोड़ रुपए के नुकसान
और बोझ का अनुमान लगाया गया था। बहरहाल प्रधानमंत्री के विशेषाधिकार के सामने तमाम दलीलें
बेमानी हैं।
तब भी कुछ चुनाव होने थे और अब भी गुजरात और हिमाचल में विधानसभा चुनाव करीब हैं,
लिहाजा प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, यानी 5 किलोग्राम मुफ्त अनाज प्रति व्यक्ति, की
अवधि बढ़ाई गई है। आकलन है कि इससे 45,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ देश के खजाने
पर पड़ेगा। भारत पर कजऱ् का बोझ भी काफी है। इसके अलावा, भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक
नीति समिति का नया अनुमान है कि 2022-23 के वित्त वर्ष में आर्थिक विकास दर 7.2 फीसदी के
बजाय 7 फीसदी रह सकती है। यह उससे कम भी हो सकती है। कोर सेक्टर के 8 क्षेत्रों में विकास
दर 3.3 फीसदी तक लुढक़ आई है और मुद्रास्फीति की दर 6.7 फीसदी ही रह सकती है। मई से

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सितंबर के दौरान रेपो रेट चार बार बढ़ाने पड़े हैं। यह बोझ भी आम आदमी को झेलना पड़ रहा है।
चूंकि मुफ्त अनाज 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुहैया कराया जा रहा है, लिहाजा साफ है कि इतने
लोगों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़़ नहीं है कि वे अपने भोजन का बंदोबस्त कर सकें। सरकार मुफ्त
अनाज बांटेगी, तो उनका गुजर-बसर होगा। हालांकि देश में खाद्य सुरक्षा कानून की व्यवस्था है,
जिसके तहत गेहूं, चावल, चीनी आदि बेहद सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। उसके बावजूद 80 करोड़
लोगों को मुफ्त अनाज बांटना पड़ रहा है, यह स्थिति समझ के परे है। ऐसे परिदृश्य में 5-जी संचार
प्रौद्योगिकी का आगाज़ अनिवार्य नहीं लगता।
बेशक यह सराहनीय, वैज्ञानिक उपलब्धि है, लेकिन सरकारी अनाज को मोहताज तबके के लिए यह
सवालिया और चिंतनीय है। अभी तक 4-जी से काम अच्छी तरह चल रहा था। जो आदमी गरीब,
भूखा और बेरोजग़ार है, उसे स्मार्ट मोबाइल खरीदने को बाध्य करना उचित नहीं है। बेशक 5-जी के
बाद कोई भी मूवी 5-7 सेकंड में डाउनलोड की जा सकेगी, इंटरनेट की गति कई गुना बढ़ जाएगी, दूर
बैठा डॉक्टर एक रोबोट के जरिए दिल का ऑपरेशन भी कर सकेगा, संचार में क्रांति के आयाम जुड़ेंगे
और ऐसे ही असंख्य काम किए जा सकेंगे। इंटरनेट गांवों में क्या अभी शहरों में भी कट-कट कर
आता है। देश में 6 लाख से ज्यादा गांव और पंचायतें हैं। गली में चलने वाला रिक्शाचालक न तो
कार्ड से और न ही डिजिटल तरीके से मजदूरी लेगा। कई केंद्रों और बड़ी दुकानों पर आज भी नकद
ही मांगते हैं, क्योंकि अभी नई प्रौद्योगिकी समझ के बाहर है।
मेट्रो की सुरंग में निर्माण-कार्य चल रहा है और प्रधानमंत्री एक प्रायोजित मजदूर से संवाद करते हैं,
तो वह सरकार की भाषा ही बोलेगा। अलबत्ता 5-जी निर्माण-कार्य कैसे कर सकती है? मोबाइल का
हम उत्पादन कम करते हैं और ‘एसेंबल’ अधिक करते हैं, लिहाजा कच्चा माल आयात करना पड़ता
है। हम दूसरों पर आश्रित हैं, लिहाजा मोबाइल बनाने के दावे आधे-अधूरे हैं। सरकार सार्वजनिक
कंपनियों-बीएसएनएल और एमटीएनएल-को 4-जी ही पूरी तरह मुहैया करा दे। निजी कंपनियों के
सहारे देश को छोडऩा क्या उचित है? हम 5-जी के खिलाफ नहीं हैं। जहां यही प्रौद्योगिकी कारगर हो
सकती है, वहां चूकना नहीं चाहिए, लेकिन मुफ्त अनाज वाले वर्ग के लिए यह न तो बुनियादी जरूरत
है और न ही उसे चमत्कृत किया जाना चाहिए। सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि क्योंकर आज
भी करोड़ों लोगों को मुफ्त में अनाज बांटने की जरूरत है? इस तरह की योजनाओं से यह समस्या तो
हल हो जाती है कि कोई भूखे पेट नहीं सोता, लेकिन इसका कोई दीर्घकालिक लाभ नहीं है। उलटे
राजकोष पर बोझ पड़ता है।

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