जनता से फिर जुड़ने को तैयार है कांग्रेस

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जनता से फिर जुड़ने को तैयार है कांग्रेस

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

कांग्रेस को आज एक ऐसे मुखिया की जरूरत है जो कुछ बुनियादी बदलाव कर सके और मौजूदा
सरकार का स्पष्ट विकल्प पेश कर सके। निश्चित रूप से पार्टी को सबसे पहले राष्ट्र को फिर से
एकजुट करना होगा जो राहुल गांधी की 'भारत-जोड़ो यात्रा' जैसा विषय है लेकिन इसके साथ ही
अर्थव्यवस्था पर एक नयी नीति, शांति, अहिंसा और सतत विकास पर एक नए नजरिए की भी
आवश्यकता है।
दिवंगत वरिष्ठ कांग्रेस नेता और महासचिव विठ्टलराव एन गाडगिल ने एक बार कहा था- 'भारत के
किसी भी गांव में जाइये, आपको तीन बातें निश्चित मिलेंगी- डाकिया, पुलिसकर्मी और कांग्रेस पार्टी।
गाडगिल ने यह बताने की कोशिश की थी कि कांग्रेस राष्ट्र के ताने-बाने में कितनी शामिल है।
निश्चित रूप से यह संबंध बहुत पहले था। तब पार्टी का आमजनता के साथ जमीनी स्तर पर संपर्क
जीवित था, लोगों की भावनाओं को पढ़ने, उनसे जुड़ने, अपना आधार बनाने और लोगों में अपना
एजेंडा खड़ा करने की उसके पास व्यवस्था थी। यह संबंध समय के साथ नष्ट होता गया। संबंधों में
और गिरावट तब आई जब कांग्रेस ने अपना नियंत्रण एक नौकरशाह को सौंप दिया। यह नौकरशाह
अपने समय में बहुत प्रशंसित था जिसने प्रधानमंत्री के रूप में दो कार्यकाल तक शासन किया अंतत:
जिसका शासन भाजपा के राष्ट्र की प्रमुख पार्टी बनने के साथ समाप्त हो गया। बतौर नौकरशाह
जीवनयापन करने वाले डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस का अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति से
कोई संबंध नहीं हो सकता था। उनका काम खेल को मैनेज करना था।

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आर्थिक संकट से निकालने का मतलब था कि उन्होंने अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के
कार्यकाल में जो सुधार शुरू किए थे उसकी नौका संतुलित रूप से पार होती जाए। इस प्रक्रिया में
जमीनी स्तर के लोगों के बारे में बात करने और सोच का तरीका बदल गया। सरकार तथा कांग्रेस की
भाषा उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण में बदल गई- वे सब बातें जिनका भारत की विशाल
जनसंख्या से कोई लेना-देना नहीं था। डॉ. सिंह अक्सर मुंबई जाया करते थे लेकिन कार्यकर्ताओं से
मिलने के लिए कभी भी एक सामूहिक रैली तक नहीं कर सके। क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया में उनकी
लंच मीटिंग आम बात थी जिसका आयोजन उस समय के मुंबई पार्टी प्रमुख और व्यवसायी मुरली
देवड़ा किया करते थे।
इस बात को याद करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस अब अपना स्वरूप बदलना चाहती है,
चुनाव कराना चाहती है तथा लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नेता को पार्टी की कमान सौंपना चाहती है।
भारत की सबसे पुरानी पार्टी के इतिहास में यह फैसला मील का एक महत्वपूर्ण पत्थर है। पार्टी को
बदलाव की जरूरत है, आंतरिक लोकतंत्र से इसका भला ही होगा। पार्टी पर वंशवादी नियंत्रण निश्चित
रूप से एक समस्या है लेकिन इनमें से कोई भी पार्टी के पतन का कारण नहीं है। आम लोगों और
मेहनतकश वर्गों की जरूरतों और आकांक्षाओं से दूर जाने के कारण ही पार्टी की यह हालत हुई है।
कांग्रेस ने कई महत्वपूर्ण बड़े सुधार किए। उदाहरणार्थ, काम करने का अधिकार देने के लिए मनरेगा
की शुरूआत, स्कूल मिड-डे मील योजना का आरंभ लेकिन कमजोर वर्ग के लिए उसके लहजे और
आशय को बदला नहीं जा सका। यह एक ऐसी पार्टी की कहानी बन गई जो गरीबों और दबे-कुचले
लोगों से दूर हो रही थी, भ्रष्टाचार में उलझी हुई थी और किसानों के बजाय सत्ता के दलालों की
तलाश में लगी हुई थी। इसका नतीजा यह हुआ कि पार्टी आज भारत की राजनीति में काफी निचले
पायदान पर है।
मीडिया में अब जी-23 के नाम से मशहूर कथित बागी कांग्रेस नेताओं को महत्व दिया जा रहा है जो
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं। बागी इस बात को भूल गए हैं कि यदि जी-23 के सभी
नेताओं की बात न करें तो भी इनमें से कई नेताओं ने जनता से खुद को अलग-थलग कर लिया था।
वे एक ऐसी पार्टी में बढ़े जो आम जनता से दूर हो गई थी या कम से कम उसे इस तरह से देखा
जा रहा था। एक अलग वर्ग के लिए बनाई गई किसी भी पार्टी के लिए जी-23 में शामिल नेता बहुत
कम या बिलकुल भी उपयोगी साबित नहीं होंगे। उन्हें कोई वोट नहीं मिलेगा। जिस तरह से जी-23 के
सदस्यों ने इस्तीफा दिया है उससे देखा जा सकता है कि वे केवल एक बिंदु तक प्रतिबद्ध थे। वे
पार्टी में तब तक रहे जब तक उन्हें यह यकीन था कि यहां रहने में फायदा है। जी-23 को पूरी तरह
खारिज करने की जरूरत नहीं है लेकिन इसके ज्यादातर नेता सौम्य, उच्चस्तरीय, अच्छे संपर्कों से
जुड़े हुए कुलीन थे। वे जमीन से जुड़े हुए राजनेता नहीं थे जो जनता की नब्ज को समझ सकते थे।
कांग्रेस को आज एक ऐसे मुखिया की जरूरत है जो कुछ बुनियादी बदलाव कर सके और मौजूदा
सरकार का स्पष्ट विकल्प पेश कर सके। निश्चित रूप से पार्टी को सबसे पहले राष्ट्र को फिर से
एकजुट करना होगा जो राहुल गांधी की 'भारत-जोड़ो यात्रा' जैसा विषय है लेकिन इसके साथ ही
अर्थव्यवस्था पर एक नयी नीति, शांति, अहिंसा और सतत विकास पर एक नए नजरिए की भी

आवश्यकता है। ये सारे मुद्दे भारत की जनता के लिए एक अच्छे से पैक किए गए संदेश के रूप में
जाने चाहिए, विशेष रूप से उत्तरी राज्यों में जहां पार्टी ने भारी मार खाई है और भाजपा के सामने
अपना सारा जनाधार खो दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष पद के दावेदार के रूप में सामने आए शशि थरूर
ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो कांग्रेस को उसकी जमीन वापस दिला सकें। वे सौम्य, साफ व अच्छी सोच
वाले, अर्थपूर्ण और अपनी बात को अच्छी तरह से समझा सकते हैं।
उनका विरोध इसलिए नहीं होना चाहिए कि वे जी-23 का प्रतिनिधित्व करते हैं और उन्होंने कांग्रेस
नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाई थी लेकिन उन्हें उसी असफल समूह के उप वर्ग के रूप में नामित
और मान्यता दी जानी चाहिए जिनके सदस्यों ने पार्टी के कारण सत्ता तो हासिल की किन्तु उसके
विकास में बहुत कम योगदान दिया। थरूरवाद ट्विटर फीड के लिए अच्छा है पर उससे वोट नहीं
हासिल कर सकते, जनता से जुड़ नहीं सकते या एक सशक्त आख्यान को नहीं जोड़ सकते जो पार्टी
के इस कठिन समय की सख्त जरूरत है। थरूर को लगता है कि वे इस पद के प्रत्याशी हो सकते हैं
या चुनाव लड़ सकते हैं तो यह अपने आप में दर्शाता है कि वे अथवा उनसे सहानुभूति रखने वाले
लोग कांग्रेस के सामने खड़ी चुनौती से कितने दूर हो सकते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस के लिए इस समय अच्छा काम करने वाले व्यक्ति राहुल गांधी ही हैं
जो देशव्यापी वॉकथॉन के साथ चल रहे हैं। उन्होंने इसे 'तपस्या' कहा है क्योंकि वे जनता के साथ
फिर से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। वे मूड पढ़ते हैं और पता लगाते हैं कि नफरत और विभाजन के
माहौल में राष्ट्र के तेजी से हो रहे पतन के बारे में वे और उनकी पार्टी जनता को कैसे समझा सकते
हैं। राहुल गांधी की भाषा अच्छी लग रही है, उनके बयानों में अर्थ भी है। उनकी असली परीक्षा देश
के उत्तरी भाग में प्रवेश करते ही होगी। इस वक्त तो यही प्रतीत होता है कि एक सशक्त कहानी
आकार ले रही है। इनमें से कुछ स्पष्ट विषय हैं जो पार्टी और राष्ट्र के पुनर्निर्माण में बहुत मदद कर
सकते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस को आंतरिक चुनाव के साथ-साथ एक निर्वाचित प्रमुख
को शीर्ष पर रखना चाहिए तथा अधिक से अधिक ऐसे पद गठित करने चाहिए जो लोकतांत्रिक ढंग से
भरे गए हों।
अंत में, पार्टी का झुकाव उन लोगों की ओर होना चाहिए जो जनता से जुड़े हुए हैं और वोट ला सकते
हैं। अगर 'भारत-जोड़ो' यात्रा इसी तरह सद्भावना अर्जित करना जारी रखती है तो आने वाले वर्षों से
राहुल गांधी वे नेता हो सकते हैं जो जमीनी तौर पर जुड़े हैं। तब वे सही ढंग से दावा कर सकते हैं
कि उन्होंने यह पद अर्जित किया है और यह उन्हें जन्मसिद्ध अधिकार के रूप में नहीं मिला है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट : दी बिलियन

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