जंग, परमाणु आपदा और खाद्य पदार्थों के संकट के बीच आया नोबेल पुरस्कारों का दौर

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विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

स्टाकहोम, 30 सितंबर यूक्रेन पर रूस के हमले से यूरोप में दशकों तक रही लगभग
निर्बाध शांति की स्थिति के बिगड़ने और परमाणु आपदा का खतरा पैदा होने के बीच इस साल के
नोबेल पुरस्कारों की घोषणा का समय आ गया है।
नोबेल पुरस्कार की चयन समिति कभी इस तरफ इशारा नहीं करती कि चिकित्सा, भौतिकी, रसायन,
साहित्य, अर्थशास्त्र और शांति के क्षेत्र में किसे यह पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। लोग केवल
अनुमान लगाते हैं। सोमवार से पुरस्कारों की घोषणा शुरू हो सकती है।
दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार पर लोगों का ध्यान जाने के यूं तो अनेक कारण हैं, लेकिन इस
बार यूक्रेन और इथियोपिया में युद्ध, ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति में व्यवधान, बढ़ती
असमानता, जलवायु संकट और कोविड-19 महामारी की वजह से जारी समस्याएं प्रमुख हैं।
यूरोपीय संसद के सदस्यों ने इस साल नोबेल शांति पुरस्कार समिति द्वारा यूक्रेन के राष्ट्रपति
वोलोदिमीर जेलेंस्की और यूक्रेन की जनता के लिए इस पुरस्कार की सिफारिश किये जाने की वकालत
की। रूस के हमले के खिलाफ उनके प्रतिरोध के लिए ऐसा किया जा रहा है।
स्टाकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक डैन स्मिथ ने कहा कि इस तरह की
आकांक्षाओं को समझा जा सकता है लेकिन इसकी संभावना कम नजर आती है क्योंकि नोबेल
समिति का ऐसे लोगों को सम्मानित करने का इतिहास रहा है जो संघर्षों को समाप्त करते हैं, न कि
युद्धकालीन नेताओं को सम्मानित करने का।
स्मिथ मानते हैं कि नोबेल शांति पुरस्कार के दावेदारों में जलवायु परिवर्तन से लड़ने वाला कोई
व्यक्ति या समूह या अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) हो सकती है।

स्मिथ ने कहा कि आईएईए को सम्मानित करना एक बार फिर यूक्रेन में रूस के कब्जे वाले
जापोरिज्जिया परमाणु ऊर्जा संयंत्र में किसी रेडियोधर्मी विकिरण की आपदा को रोकने के प्रयासों और
परमाणु प्रसार से लड़ने में उसके काम को रेखांकित करेगा।
उन्होंने कहा, ‘‘वैश्विक इतिहास में यह वाकई मुश्किल समय है और शांति की अच्छी स्थिति नहीं बन
रही।’’
नोबेल शांति पुरस्कार के लिए हमेशा शांति को बढ़ावा देने के कार्यों को ही नहीं चुना जाता।
बीसवीं सदी में अहिंसा के प्रतीक रहे महात्मा गांधी को कभी यह सम्मान नहीं मिला।
इथियोपिआई प्रधानमंत्री अबीय अहमद को 2019 में पड़ोसी देश एरिट्रिया के साथ शांति के लिए
नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था। एक साल बाद ही देश के तिगरे क्षेत्र में बड़े स्तर पर जातीय
संघर्ष भड़क गये थे।
कुछ लोग अबीय पर तनाव बढ़ाने का आरोप लगाते हैं जिसकी वजह से अत्याचार हुए। आलोचकों ने
यह भी मांग की कि उनके नोबेल पुरस्कार को वापस लिया जाना चाहिए।
म्यांमा की कार्यकर्ता आंग सान सूची को 1991 में शांति पुरस्कार से नवाजा गया। उस समय वह
सैन्य शासन का विरोध करने के कारण घर में नजरबंद थीं।
कुछ दशक बाद वह देश के मुस्लिम रोहिंग्या अल्पसंख्यकों के खिलाफ सेना के अत्याचारों को रोकने
में नेतृत्व की भूमिका नहीं निभाती दिखीं।
महात्मा गांधी की हत्या 1948 में की गयी थी और उसी साल नॉर्वे की नोबेल समिति ने श्रेष्ठ जीवित
उम्मीदवार नहीं होने का हवाला देते हुए कोई पुरस्कार नहीं दिया।
पिछले साल फिलीपीन की पत्रकार मारिया रेसा और रूस के दमित्री मुरातोव को अधिपत्यवादी सरकारों
के दौर में ‘‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए साहसपूर्ण लड़ाई के लिए’’ यह सम्मान दिया गया।
साल 2022 के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा सात अक्टूबर को होगी और अर्थशास्त्र के लिए
इसके विजेता का नाम 10 अक्टूबर को घोषित किया जाएगा।

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