आखिर कैसी है दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था?

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विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए आकलन यह है कि यह एक धीमा चरण है क्योंकि विकास
की दिशा निर्धारित करने वालों को निवेश भावना के विचार के साथ चलने की आवश्यकता है। माल
व सेवाकर (गुड्स एंड सर्विस टैक्स- जीएसटी) संग्रह में लगातार बढ़ोतरी पिछले (चार महीनों में 1.4
लाख करोड़ से ऊपर) तथा औद्योगिक सूचकांक में मई व जून के लिए दो अंकों की वृद्धि जैसे कुछ
आशावादी संकेत हैं। यहां तक कि इस अगस्त के आंकड़ों के अनुसार बैंक ऋ ण वृद्धि 11 वर्षों में
सबसे अधिक है।
साल 2021 की अंतिम तिमाही के आंकड़ों के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार ग्रेट ब्रिटेन
(यूके) से बड़ा है। डॉलर के संदर्भ में की गई यह गणना क्रमश: रुपये और ब्रिटिश पाउंड तथा
अमेरिकी डॉलर के बीच वर्तमान विनिमय दरों का उपयोग करती है। सकल घरेलू उत्पाद (ग्रास
डोमेस्टिक प्रॉडक्ट- जीडीपी) के आंकड़े अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पर आधारित हैं। ये आंकड़े भारत को
संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था
बनाता है। इसी आंकड़े के अनुसार भारत की जीडीपी 3.2 ट्रिलियन डॉलर है जो अब जर्मनी के 4.2

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ट्रिलियन डॉलर से ठीक पीछे है। अगर यह 7 प्रतिशत सालाना दर से बढ़ती है और जर्मन
अर्थव्यवस्था स्थिर रहती है तो भारत चार वर्षों में जर्मनी को पीछे छोड़ देगा।
यदि यह दर 5.5 प्रतिशत की रही तो यह वृद्धि हासिल करने में पांच साल लगेंगे। भले ही आप
मानते हैं कि जर्मन अर्थव्यवस्था शून्य वृद्धि पर होगी तो भी इसमें एक पेंच है। यह पेंच है विनिमय
दर का। यदि रुपये की डॉलर दर यूरो डॉलर की विनिमय दर (चूंकि जर्मनी की मुद्रा यूरो है) की
तुलना में तेजी से घटती है तो जर्मनी को जल्दी से पछाड़ना कठिन हो जाएगा। जीडीपी वृद्धि अंतर
का लाभ आंशिक रूप से मुद्रा के अवमूल्यन के कारण अधूरा है। अगर डॉलर के मुकाबले भारत की
करेंसी मजबूत होती है तो निश्चित तौर पर डॉलर में मापी जाने वाली उसकी अर्थव्यवस्था तेजी से
बढ़ेगी। हालांकि एक मजबूत मुद्रा भारत के पक्ष में नहीं हो सकती है क्योंकि यह हमारे निर्यात को
नुकसान पहुंचा सकती है।
यदि अंतरराष्ट्रीय तुलना विनिमय दरों के प्रति बहुत संवेदनशील है तो विश्व बैंक ने एक और तरीका
तैयार किया है जिसे क्रय शक्ति समानता (परचेसिंग पॉवर पैरिटी) कहा जाता है। यह संबंधित मुद्राओं
की 'वास्तविकÓ क्रय शक्ति को प्रतिबिंबित करने के लिए विनिमय दरों को समायोजित करता है। इस
प्रकार डॉलर के मुकाबले 80 रुपये की विनिमय दर रुपये को बहुत कमजोर बनाती है। दरअसल भारत
में एक डॉलर आपको अमेरिका में एक डॉलर से ज्यादा क्रय शक्ति दिलाता है।
इस सुधार कारक को लागू करने के कारण भारत का सकल घरेलू उत्पाद दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा
बन गया है और कम से कम पांच वर्षों से ऐसा है। पब्लिक- प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के लिहाज
से चीन की अर्थव्यवस्था पहले से ही अमेरिका से बड़ी है। तेज विकास दर व विशाल जनसंख्या
आकार के कारण दो एशियाई दिग्गज चीन तथा भारत इक्कीसवीं सदी की आर्थिक तस्वीर पर छाये
रहेंगे। यह बात सभी लोगों को अच्छी तरह से मालूम है और इसके लिए एक जनसांख्यिकीय
अनिवार्यता आवश्यक है। पश्चिम और चीन के बीच उभरते तकनीकी शीत युद्ध के बावजूद कोई
आश्चर्य नहीं कि दुनिया के निवेशक इन दो बड़ी उपभोक्ता अर्थव्यवस्थाओं को गंभीरता से देख रहे
हैं।
इसलिए यह बहुत दिलचस्प नहीं है कि भारत पांचवें स्थान पर है या तीसरे अथवा वह कितनी जल्दी
जादुई 5 ट्रिलियन डॉलर के आकार को प्राप्त करेगा क्योंकि वह निश्चित रूप से वहां पहुंच जाएगा।
महामारी के वर्षों को छोड़कर पिछले चालीस वर्षों से वास्तविक रूप से भारत की अर्थव्यवस्था की
औसत वृद्धि दर 7 प्रतिशत है और 1980 के बाद से एक वर्ष भी संकुचन (यानी नकारात्मक जीडीपी
वृद्धि) का नहीं रहा है। यही भारत की विकास प्रक्रिया की ताकत है।
सवाल यह उठता है कि यह अर्थव्यवस्था कैसी चल रही है? इसका मतलब अल्पावधि को देखना तथा
उत्पादन विस्तार, रोजगार सृजन, मुद्रास्फीति नियंत्रण और राजकोषीय और व्यापार घाटे की स्थिरता
की संभावनाओं की जांच करना है। जब अर्थव्यवस्था के बारे में पूछा जाता है, तो हम उन आंकड़ों से
जांच कर सकते हैं जो शेयर बाजार अपडेट, कुछ मासिक जैसे आयात-निर्यात या औद्योगिक उत्पादन

सूचकांक, त्रैमासिक, जीडीपी की तरह और कुछ वार्षिक आधार पर बाहर निकाले जाते हैं। पिछले हफ्ते
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने बताया था कि अप्रैल से जून तिमाही के दौरान भारत की जीडीपी
36.85 लाख करोड़ रुपये थी। यह वास्तविक जीडीपी है जो मुद्रास्फीति के प्रभाव से सामने आई है।
यह आंकड़ा पिछले साल की अप्रैल से जून तिमाही के वास्तविक जीडीपी से 13.5 फीसदी अधिक है।
यह उच्च वृद्धि दर जश्न मनाने के लिए प्रेरित करती प्रतीत होती थी। हालांकि हमें इस डेटा को
इसके उचित परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। पिछले साल हम कोविड की विनाशकारी दूसरी लहर से
पीड़ित थे जो ग्रामीण क्षेत्रों में फैल गई थी। इस लहर के कारण बहुत कठिनाइयों का सामना करना
पड़ा और बड़े पैमाने पर मौतें हुईं। लॉकडाउन और अन्य बाधाओं के कारण व्यापार ठप था इसलिए
उस कम आधार पर 13.5 प्रतिशत काफी अच्छा नजर आता है। पेशेवर पूर्वानुमानकर्ताओं को उम्मीद
थी कि जीडीपी 15 प्रतिशत से ऊपर होगी।
यदि आप महामारी प्रभावित पिछले दो वर्षों के प्रभाव को हटाना चाहते हैं तो आपको 2019 के दौरान
अप्रैल से जून के जीडीपी आंकड़ों की तुलना करने की आवश्यकता है। यह 35.67 लाख करोड़ रुपये
था जिसका मतलब है कि तीन साल में तिमाही जीडीपी में केवल 3.3 प्रतिशत यानी प्रति वर्ष 1.1
प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है। यह चिंताजनक है। इस मामूली वृद्धि का अधिकांश हिस्सा
राजकोषीय विस्तार से प्रभावित है जो निश्चित रूप से आवश्यक था।
वर्तमान आंकड़ों का विश्लेषण करने का एक और तरीका जीडीपी की गति को देखना है, अर्थात
जीडीपी में एक तिमाही से दूसरी तिमाही में किस गति से तेजी आ रही है? यहां भी यह डेटा
आशाजनक नहीं दिखता है। बर्कलेज़ की रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी-मार्च से अप्रैल-जून तक तिमाही
दर तिमाही वृद्धि में 3.3 का संकुचन यानी निगेटिव ग्रोथ रही। बेशक यह नकारात्मक वृद्धि कुछ
मौसमी कारणों से हो सकती हैं।
लेकिन जनवरी-मार्च 2022 की तिमाही में पिछली तिमाही अक्टूबर-दिसंबर 2021 की तुलना में
क्रमिक वृद्धि देखी गई थी जिसमें दिवाली और क्रिसमस जैसे खर्चीले त्यौहार आते हैं। इसकी पुष्टि
इस बात से भी होती है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और क्रिसिल जैसे अन्य विश्लेषकों ने भारत के
लिए अपने विकास पूर्वानुमानों को नीचे की ओर का संशोधित किया है जो यह बताता है कि भारत
की अर्थव्यवस्था निश्चित रूप से दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती हुई एक बड़ी इकानॉमी बनी रहेगी।
यह अमेरिका और यूरोप में आई मंदी और चीन में मंदी के विपरीत है। वैश्विक स्तर पर जो कुछ भी
हो रहा है उससे भारत का भाग्य प्रभावित होता है। भारतीय रिज़र्व बैंक भी चिंतित है कि भारत
कमजोर अर्थव्यवस्था के साथ उच्च मुद्रास्फीति के चरण में प्रवेश कर रहा है। उसका अनुमान है कि
चालू वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में 4 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है और पहले से ही सख्त
मौद्रिक नीति में और सख्ती इसे निरुत्साहित ही करेगी लेकिन मुद्रास्फीति के चलते यह अपरिहार्य है।
शेयर बाजार भी इसी भावना को प्रतिबिंबित कर रहे हैं और खुद का हौसला बढ़ाने का प्रयास कर रहे
हैं।

इसलिए पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए आकलन यह है कि यह एक धीमा चरण है क्योंकि
विकास की दिशा निर्धारित करने वालों को निवेश भावना के विचार के साथ चलने की आवश्यकता है।
माल व सेवाकर (गुड्स एंड सर्विस टैक्स- जीएसटी) संग्रह में लगातार बढ़ोतरी पिछले (चार महीनों में
1.4 लाख करोड़ से ऊपर) तथा औद्योगिक सूचकांक में मई व जून के लिए दो अंकों की वृद्धि जैसे
कुछ आशावादी संकेत हैं। यहां तक कि इस अगस्त के आंकड़ों के अनुसार बैंक ऋ ण वृद्धि 11 वर्षों
में सबसे अधिक है और बैंक जमा से आगे गति बनाए हुए है। इसमें हाउसिंग और रिटेल लोन भी
शामिल हैं। इस प्रकार विकास दर वृद्धि मध्यम अवधि में सतर्क आशावाद का विषय है।

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