कहानी: समय की तंगी

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

जगदीश के पिता के देहांत की सूचना उसे सुबह-सुबह रमाकांत के फोन से मिली। कुछ देर में वह जगदीश के घर
पहुंच गया। लेकिन सुबह रमाकांत की बातों, फिर अपनी पत्नी के हाव-भाव और जगदीश के घर पर भी उसे पिता
जी के देहांत के दुख से ज्यादा किसी और बात की चिंता की अनुभूति हो रही थी।
कड़ाके की ठंड। सूरज नदारद। कोहरे का राज। रविवार का दिन हो, तो कोई अहमक ही होगा जो रजाई से
निकलकर खूबसूरत सुबह को बरबाद करे। सुबह-सुबह जब मोबाइल की घंटी बजी तो पलंग से लगभग दो फीट की
दूरी पर चार्जिंग में लगे मोबाइल को उठाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। पूरी घंटी बजी। मैं पलंग पर रजाई ओढ़े पड़ा
रहा। सोचा अगर कुछ जरूरी होगा तो सामने वाला दुबारा घंटी करेगा।
घंटी फिर बजी। मैं मन ही मन फुनियाने वाले को कोसते हुए गरमा-गरम रजाई से बाहर निकला।
मैंने कहा, हैलो..
क्या यार… भाई फोन तो उठा लिया कर… मुझे पता है आज संडे
है। दूसरी तरफ से ये मेरे अजीज मित्र रमाकांत की आवाज थी।
हां उठा लिया भाई… बोल.. इतनी सुबह-सुबह फोन.. सब खैरियत?
अरे! यार वो जगदीश है न अपना..
हां…क्या हुआ जगदीश को?
जगदीश को कुछ नहीं हुआ.. उसके पिताजी शांत हो गए।
अरे.. रे… चिच्च.. चिच्च कैसे?
अब कैसे क्या.. बूढ़े थे.. यही पचहत्तर के ऊपर के होंगे… उमर तो हो गई थी…
अबे! ये क्या बात हुई। बुजुर्ग थे तो इसका मतलब वो मर जाएं तो तेरे लिए कोई बात ही नहीं हुई…।
अरे! भाई तू तो सेंटी हो रहा है। मैं तो सिर्फ ये बताना चाह रहा था तुझे कि उस जगदीश स्साले ने तो थर्टी फर्स्ट
दिसंबर के लिए गोवा का प्रोग्राम बना रखा था। विद फेमली। अब तो सारा प्रोग्राम चैपट हो जाएगा उसका। रमाकांत
ने जगदीश की अप्रकट चिंता का पूर्वाभास करते हुए कहा।
तू भी कमाल करता है यार… तुझे गोवा की सूझ रही है.. उसका बाप मर गया। अब फालतू की बातें छोड़। पता
करके बता कि अगला प्रोग्राम क्या है?
प्रोग्राम…
अरे! हां मेरे भाई प्रोग्राम… याने कितने बजे बॉडी शमशान लेकर जाएंगे? वैसे रमाकांत की समझदारी का लोहा
हमारे फ्रेंड सर्कल

में सब मानते हैं। लेकिन मरने-वरने की खबर मिलते ही उसके हाथ-पांव ढीले पड़ जाते हैं। अर्रबर्र बकने लगता है।
मैंने फोन काट दिया और रमाकांत की अगली घंटी का इंतजार करने लगा।
श्रीमतीजी अबतक हमारी मोबाइल वार्ता रजाई में दुबके हुए सुन रही थीं, पूछने लगीं क्यों.. क्या हुआ?
जगदीश के पिताजी नहीं रहे…।
ओह नो.. श्रीमतीजी कुछ ऐसे चैंकी जैसे वो रात में जलती हुई गैस पर दूध की भगोनी रखकर भूल गई हों।
श्रीमतीजी की इस अप्रत्याशित प्रतिक्रिया को सुनकर कुछ पल के लिए मैं हतप्रभ रह गया। श्रीमतीजी और जगदीश
की पत्नी अलका में अच्छी मित्रता है। हर दो-तीन दिन के अंतराल में दोनों में बातें-वातें होती रहती हैं। पर जगदीश
के पिताजी से कभी इतना वास्ता नहीं रहा कि उनकी मृत्यु की खबर से उसे कोई आघात पहुंचे।
अलका तो कल ही कह रही थी कि उसके ससुर का आज-कल.. आज-कल चल रहा है। बेचारी परेशान थी। कह रही
थी कि जो भी होना है। थर्टी फर्स्ट के बाद ही हो। न्यू ईयर पर गोवा जाने वाली थी। एयर टिकिट बुक थे। होटल
बुक था। कितने दिनों से तैयारी कर रख थी बेचारी ने।
तुम लोग भी न कमाल करते हो…। इधर वो रमाकांत भी अभी गोवा…गोवा कर रहा था और तुम भी। अरे! पिता
मरा है उसका। कुछ तो भावनाओं को समझो। नए साल तो आते रहेंगे। वो फिर कभी और गोवा चला जाएगा।
श्रीमतीजी मेरे इस झुंझलाहट भरे वक्तव्य के बाद रजाई से निकलीं और सीधे किचन की ओर चली र्गइं। जाते-जाते
मैंने सुना वो कह रही थी। आप नहीं समझोगे…।
मैं अपनी सुबह और खराब नहीं करना चाहता था। चाय की चुस्की लेते हुए मैंने कहा, तुम तो ऐसे अपना मूड ऑफ
कर रही हो जैसे तुम्हारा गोवा जाना कैंसिल हो गया हो। थर्टी फर्स्ट तो अभी दूर है। उन्हें जाना होगा तो चले
जाएंगे।दूर से क्या मतलब.. नए साल को अब बचे ही कितने दिन हैं। तेरहवीं तक तो वो लोग कहीं जा ही नहीं
सकते। याद है न आपको… अलका की सास जब मरी थी तो पूरे साल जब तक बरसी नहीं मनी तब तक शोक
मनाया था उनके घर वालों ने।
अलका की ननद की शादी भी इसी चक्कर में टल गई थी। तेरहवीं के बाद भी अगर ये लोग गए, तो दुनिया क्या
कहेगी। आपको मालूम है, न एयर टिकिट का पैसा रिफंड होने वाला है और न ही होटल का। पैसे की अच्छी चपत
लगने वाली है बेचारी को।
मैं श्रीमतीजी की इसबात के जवाब में कुछ कहता इससे पहले मोबाइल की घंटी बज गई। रमाकांत का फोन था।
लेटेस्ट अपडेट के साथ।
अच्छा सुनो गुरु…ग्यारह बजे का प्रोग्राम है। वो जगदीश का अमरीकावाला भी नहीं आ रहा है। उसने अमरीका से
स्काइप पर जगदीश से बात कर ली है और पिताजी के अंतिम दर्शन भी कर लिए हैं। इटारसी वाला भाई बस एक
डेढ़ घंटे में भोपाल पहुंच जाएगा। उसी का इंतजार है। तो फिर ग्यारह बजे जगदीश के घर मिलते हैं।

जगदीश के घर पर मैं ठीक ग्यारह बजे हाजिर था। लोग खामोशी से खड़े अंतिम यात्रा प्रारंभ होने का इंतजार कर
रहे थे। इटारसी वाले भाई ने अभी-अभी ऑटो वाले को पैसे देकर घर में प्रवेश किया है। न जाने मुझे ऐसा क्यूं लग
रहा था कि वो जगदीश को देखते ही उससे लिपटकर रोने लगेगा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
अलबत्ता जगदीश की अविवाहित बहन जिसका विवाह मां की मृत्यु के कारण टल गया था, इटारसी वाले भैया को
देखते ही उससे लिपटकर रोने लगी।यूं तो अमरीका वाले भाई बड़े थे। पिताजी का अंतिम संस्कार उन्हें ही करना
था। पर वे मौजूद नहीं थे, सो अब दूसरे नंबर पर जगदीश से छोटे इटारसी वाले भाई का हक बनता था कि वो
पिताजी का दाह संस्कार करे। लेकिन रिवाज है कि जो दाग देता है, उसे बाल देना अनिवार्य होता है।
इटारसी वाले भाई को बैंक मैनेजर्स की कॉन्फ्रेंस में मुंबई जाना था। इसलिए बाल कटवाने से उसने कन्नी काट ली।
अब बचा जगदीश सो उसने दाग भी दिया और बाल भी दिए। अंतिम यात्रा अंतिम संस्कार के साथ संपन्न हुई।
आधे से ज्यादा लोग शमशान घाट से ही अपने घर निकल लिए। संडे जो था। वे छुट्टी का बचा-खुचा समय जाया
नहीं करना चाहते थे। मैं और रमाकांत भी मरघट से बस निकलने ही वाले थे कि जगदीश ने रोकते हुए कहा, यार
कुछ देर रुक जाओ… घर चलकर अगला प्रोग्राम भी तय ही कर लेते हैं।
हां भाई साब कुछ देर और रुक जाइए… अभी फाइनल कर लेते हैं..। इटारसी वाले ने मुझसे चिरौरी करते हुए कहा।
अलका ट्रे में पानी के गिलास के साथ प्रवेश करते हुए बोली, आजकल तो सब इतने व्यस्त रहते हैं भाई साब…
किसी के पास इतना टाइम कहां है कि तेरह दिन तक रुकें। नौकरी है। बच्चों के स्कूल हैं। मैं तो सोचती हूं क्यों न
हम शॉर्टकट में सारे किरया-करम निपटा दें… क्यों भाई साब आप क्या कहते हैं? ट्रे में रखा पानी का गिलास मेरी
तरफ बढ़ाते हुए अलका ने कहा। अलका ने मुझे धरम संकट में डाल दिया। वो अपने प्रस्ताव पर मेरा समर्थन
चाहती थी और जगदीश की मुहर।
अब मैं क्या कहूं। आप लोग खुद विचार कर लें। आपके परिवार का मामला है। वैसे आजकल तो मेट्रो सिटीज में
सारे मृत्यु संस्कार तीन दिन में झटपट निपटा कर लोग फारिग हो जाते हैं। मैंने मंजे हुए पॉलिटिशियन की तरह
प्रश्न का जवाब भी दे दिया और ठीकरा भी अपने सिर पर फुड़वाने से बच गया।हां भाई साब सब तीन दिन में
निपटा देते हैं। मुझे भी दो दिन बाद मुंबई के लिए निकलना है। मेरी फ्लाइट भी यहीं भोपाल से है। देखिए न कैसा
योग है। इटारसी वाले भाई ने जगदीश से कहा।
अब धरम संकट में फंसने की बारी जगदीश की थी, मैं क्या बोलूं जैसी तुम सबकी राय। पंडितजी से ओपिनियन
और ले लेते हैं। जगदीश ने लगभग सरेंडर कर दिया।
रमाकांत के पास पंडितजी का नंबर था। नंबर मिलाकर उसने इटारसी वाले भाई को मोबाइल पकड़ा दिया। स्पीकर
भी ऑन कर दिया ताकि सब सुन सकें और यदि किसी को कुछ और पूछना-पाछना हो तो पूछ सके। हैलो.. हां
पंडितजी.. प्रणाम.. आज हमारे पिताजी का देहांत हो गया है। कल फूल बिनने का कार्यक्रम है। हम चाहते हैं कि
तीसरे दिन ही हम तेरहवीं वगैरह का कार्यक्रम कर दें। आपकी क्या राय है।वैसे क्या उमर रही होगी बेटा पिताजी
की। पंडितजी ने पूछा इटारसी वाले भाई ने जगदीश की ओर देखा। फिर जगदीश ही बोला-यही पचहत्तर के ऊपर ही
रहे होंगे।

तो इसका मतलब है बुजुर्ग थे। जवान मौत होती तो रीति रिवाज के बारे में एक बार सोचते भी। कोई हर्ज नहीं
बेटा। हम तीन दिन में सब निपटा देंगे। अब तुम यूं समझो बेटा कि आज के समय की डिमांड को देखते हुए हम
लोगों के पास भी इन कर्म-कांडों की लघु प्रक्रिया है। जिसमें उठावना, तेरहवीं सारे कार्यक्रम हम तीसरे दिन में ही
निबटवा देते हैं। इसमें समय भी कम और खर्चा भी कम।
पैसे की चिंता आप न करें पंडितजी। बाबूजी की दुआएं हैं हम पर। भगवान का दिया सब कुछ है हमारे पास। बस
समय की तंगी है। आप तो पूजा पाठ की तैयारी करें। खर्चे की फिक्र न करें। अच्छा नमस्ते पंडित जी। इटारसी
वाले भाई ने एक लंबी गहरी सांस ली और मोबाइल रमाकांत को लौटा दिया।
अलका और इटारसी वाले भाई के चेहरे पर अब तक जो चिंता की रेखाएं खिंची थी पंडितजी की बात सुनते ही
डिलीट हो र्गइं। अब मुंबई और गोवा दोनों यात्राएं अटल थीं। जगदीश ने दरवाजे पर खड़ी बहन की ओर एक नजर
देखा। वो खामोश थी।

कविता
अहिल्या…
-तहसीन मजहर-
तुम्हें है सिर्फ अपनी दुनिया से मुहब्बत
तुम चाहते हो एक अलग आशियाना
जो शायद मेरी तरह नहीं,
और मैं टूटती चली जाती हूं
पतझड़ बनकर बिखरती हुई
किरचों में बिखरी हुई मैं
खुद को जोड़ने की जद्दोजहद में हार जाती हूं,
लेकिन मुझे टिकना है
इस दुनिया की भीड़ में
पर तुम उस दौड़ का हिस्सा बन दौड़े जा रहे हो
जहां पहुंचते ही मेरे भीतर
बहुत कुछ दूर होता चला जाता है,
समझाना मुश्किल है
कैसे जाने दूं , कैसै भूल जाउं उसे
जो हर राह पर टिक कर खड़ा रहा
साथ मेरे, सहारा बनकर
जिसने थामी मेरी हथेलियां, जैसे मैं हूं कोई छोटी बच्ची,

अब क्या कहूं
तुमसे हजार शिकायतों के बावजूद
अंत में वहीं पहुंच जाती हूं, जहां से शुरू हुई थी.
बस इतना समझ लो
तुम मर्यादापुरुषोत्तम भले हो जाओ
मुझे नहीं जरूरत तुम्हारे स्पर्श की,
मैं हो ही नहीं सकती पत्थर
किसी के श्राप से…।

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