मताधिकार को लेकर घमासान

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के हटने से देश के सभी केन्द्रीय क़ानून राज्य में लागू हो गए हैं। यह साधारण सी
बात शेख अब्दुल्ला परिवार के फारूक अब्दुल्ला भी अच्छी तरह जानते हैं। मुफ़्ती मोहम्मद सैयद की बेटी महबूबा
सैयदा भी जानती हैं। यदि उनको इसका इल्म नहीं था तो उनके वकीलों ने अब तक उन्हें बता ही दिया होगा।
कांग्रेस इसको नहीं जानती, इसका तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन इसके बावजूद ये तीनों दल पिछले दिनों
श्रीनगर में एकत्रित हुए और इन्होंने कहा कि राज्य में उन लोगों का नाम भी मतदाता सूची में लिखा जा रहा है जो

‘आम तौर पर जम्मू कश्मीर में रहते हैं’। देश भर में जो मतदाता सूचियां तैयार होती हैं, वे इसी आधार पर तैयार
होती हैं। जो व्यक्ति आम तौर पर जिस स्थान पर रहता है, उसी स्थान पर उसकी वोट बनती है और उसे मतदान
करने का अवसर मिलता है। उदाहरण के लिए महबूबा मुफ़्ती के पिता जी मुफ़्ती मोहम्मद सैयद एक बार उत्तर
प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लड़े थे और जीत भी गए थे। ज़ाहिर है उस प्रदेश की मतदाता सूची में उनका नाम
शामिल रहा होगा। अब यह तो महबूबा मुफ़्ती ही बता पाएंगी कि उनके पिता जी वहां आम तौर पर रहते थे या
नहीं? लेकिन क़ानून ने उनको यह अधिकार दिया था कि यदि आप आम तौर पर वहां रह रहे हो तो केवल वोट देने
का अधिकार ही नहीं, बल्कि चुनाव लडऩे का अधिकार भी मिलता है। लेकिन प्रश्न उठता है कि क़ानून और नियम
व्यवस्था को जानने बूझने के बावजूद कांग्रेस के साथ मिल कर अब्दुल्ला और महबूबा शोर क्यों मचा रहे हैं? वैसे
उन्होंने शोर मचाने के लिए राज्य के राजनीतिक दलों को जो निमंत्रण भेजा था, उसमें इन तीनों को छोड़ कर और
कोई राजनीतिक दल शामिल नहीं हुआ। न तो सज्जाद लोन की पीपुल्स कान्फ्रेंस और न ही बुख़ारी की अपनी
पार्टी।
अलबत्ता रिक्त स्थानों कि पूर्ति के लिए शिव सेना, सीपीएम बैठाए गए थे। जम्मू कश्मीर में आगामी विधानसभा
चुनावों के लिए मतदाता सूचियां तैयार की जा रही हैं। उनमें दो ऐसे वर्ग हैं जिनको आज तक मतदाता सूचियों में
शामिल नहीं किया जाता था। पहला वर्ग तो उन लोगों का है, जो किन्हीं कारणों से जम्मू कश्मीर में रह रहे हैं।
कोई मज़दूरी कर रहा है, कोई नौकरी कर रहा है। कोई किसी प्रोजैक्ट में काम कर रहा है। अभी तक उनको वोट
देने का अधिकार नहीं था। अपने गांव या शहर में वे इसलिए वोट नहीं डाल सकते थे क्योंकि वहां वे रहते नहीं हैं,
जम्मू कश्मीर सरकार उन्हें इसलिए वोट नहीं डालने देती थी क्योंकि वे इस राज्य के स्थायी निवासी नहीं हैं।
लेकिन अनुच्छेद 379 के समाप्त हो जाने से ‘स्थायी’ की शर्त ख़त्म हो गई और बाक़ी प्रांतों की तरह ‘आम तौर
पर रहने’ की शर्त लागू हो गई। इसलिए यह वर्ग जो अभी तक अपनी रोज़ी रोटी के चक्कर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया
से ही बाहर हो गया था, वह फिर उस प्रक्रिया का हिस्सा बन गया है। दूसरा वर्ग ऐसा है जो जम्मू कश्मीर में ही
स्थायी तौर पर रहता है। लेकिन फिर भी उन्हें विधानसभा चुनाव में वोट देने का अधिकार नहीं है। ये वे लोग हैं
जो 1957 के विभाजन के कारण पंजाब के स्यालकोट, जो जम्मू से महज़ बीस मील दूर था, से भाग कर जम्मू में
आ गए थे। पंजाब के ये लोग 1947 से लेकर अब तक स्थायी तौर पर जम्मू कश्मीर में ही रहते हैं। लेकिन
अब्दुल्ला और महबूबा की नजऱ में ये स्थायी नहीं हैं। कारण पूछने पर बताते हैं कि ये पंजाबी हैं। 1947 में जम्मू
कश्मीर के जो लोग भाग कर पंजाब में पहुंच गए, उनको पंजाब में मतदान का अधिकार मिल गया लेकिन पंजाब
के जो लोग भाग कर जम्मू कश्मीर गए उनके मतदान का विरोध आज भी अब्दुल्ला और महबूबा कर रहे हैं। नई
मतदाता सूचियों में इन दोनों वर्गों को क़ानून के अनुसार शामिल किया जा रहा है। इसी का विरोध सैयद और शेख
मिल कर कर रहे हैं। ये शेख और सैयद इस विरोध का जो कारण दे रहे हैं, वह और भी हास्यास्पद है। उनका
कहना है कि इससे राज्य की जनसंख्या का अनुपात बदल जाएगा।
जनसंख्या अनुपात बदलने का अभिप्राय शायद यह है कि राज्य में इस्लाम मत और शिया मत को मानने वाले
मतदाताओं की संख्या कम हो जाएगी। अब इन भलेमानुसों से कोई पूछे कि राज्य में इस्लाम मत और शिया मत
को मानने वालों का नाम क्या मतदाता सूची से काटा जा रहा है? यदि नहीं काटा जा रहा तो उनकी जनसंख्या कम
कैसे हो जाएगी? वे कह सकते हैं कि अनुपात बिगड़ जाएगा। उनका यह प्रचार शरारतपूर्ण है। क्योंकि जम्मू कश्मीर
में जो मज़दूर बाहर से आकर काम कर रहे हैं और वहां आम तौर पर रह रहे हैं वे ज़्यादातर इस्लाम मत को या
फिर शिया मत को मानने वाले ही हैं। इस लिए अनुपात बिगडऩे का ख़तरा भी नहीं है। जम्मू कश्मीर के इन शेखों
और सैयदों को एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए कि मतदाता सूचियों में जिन के नाम दर्ज होंगे वे ज़्यादातर

देसी मुसलमान हैं, शेख और सैयद नहीं हैं। दरअसल सैयदों की बड़ी चिंता यही है कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति
के बाद कश्मीर का देसी मुसलमान उनके नियंत्रण से बाहर हो रहा है। शेखों, सैयदों, तुर्कों व मुग़लों की संख्या
कश्मीर घाटी में आटे में नमक के बराबर भी नहीं है। महज़ एक या दो प्रतिशत। लेकिन अब तक वे धारा 370 के
कारण देसी कश्मीरी मुसलमानों पर नियंत्रण बनाए रखते थे। लेकिन उनका यह नियंत्रण ढीला पड़ता जा रहा है।
अब नई व्यवस्था में तो गुज्जरों के लिए ही विधानसभा की 9 सीटें आरक्षित कर दी गई हैं। गुज्जरों ने चाहे अरसा
पहले इस्लाम मत को स्वीकार कर लिया था, लेकिन ये शेख और सैयद उनको अपने नज़दीक खड़े होने के काबिल
भी नहीं मानते थे। लेकिन अब धारा 370 के हटने से हालात बदल गए हैं। शेखों और सैयदों की यही चिंता है।
या खुदा अब गुज्जरों के आगे हाथ फैलाने पड़ेंगे। इतना ही नहीं अब तो इनको वातलों के आगे भी नाक रगडऩा
पड़ेगा। शेखों और सैयदों की असली चिंता यही है। लेकिन अब अंदर का यह दर्द सार्वजनिक रूप से बता नहीं
सकते। इसलिए जम्मू कश्मीर में रहने वालों को पहली बार उनके सांविधानिक अधिकार वापस मिलेंगे, इसको लेकर
वहां के देसी मुसलमानों को गुमराह करने के लिए वे यह निराधार ही नहीं बल्कि शरारतपूर्ण प्रचार कर रहे हैं।
श्रीनगर की गुपकार रोड पर रहने वाले शेखों और सैयदों का का कहना है कि यदि पंजाब से विस्थापित होकर आए
पंजाबियों को वोट का अधिकार दे दिया तो राज्य में डोगरों और सिखों की पहचान ख़तरे में पड़ जाएगी। डोगरों की
पहचान जम्मू से लेकर पठानकोट से होती हुई कांगड़ा तक फैली हुई है। स्यालकोट से विस्थापित जिन पंजाबियों को
वोट का अधिकार दिया जा रहा है, उनकी तो पहचान और रहन-सहन ही जम्मू के डोगरों से मिलता है। इसलिए
पंजाब के विस्थापितों को वोट का अधिकार दे देने से डोगरों की पहचान ख़तरे में नहीं पड़ेगी, बल्कि और मज़बूत
होगी। रही पहचान सिखों की, क्या सैयद बताएंगे कि सिखों की पहचान पंजाबियों को अधिकार मिलने से मज़बूत
होती है या कमजोर? सबसे बड़ी बात तो यह कि इन सब प्रश्नों पर फतवा देने का अधिकार शेखों और सैयदों को
किसने दिया? ये प्रश्न कश्मीर के देसी कश्मीरियों से ताल्लुक रखते हैं, वहां के गुज्जरों, पहाडिय़ों, शिया पंथियों,
वातलों, हाजियों से ताल्लुक रखते हैं। अनुच्छेद 370 के हटने से वे इतने सक्षम हो गए हैं कि ख़ुद इन पर निर्णय
कर सकें।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार है)

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