शिवसेना आखिर किसकी

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

सुप्रीम कोर्ट ने एकनाथ शिंदे की शिवसेना बनाम उद्धव ठाकरे की शिवसेना केस को संविधान पीठ को भेज दिया
है। तीन जजों की बेंच ने 8 सवाल तैयार किए हैं, जिसके आधार पर संविधान फैसला करेगी कि शिवसेना किसकी
है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि वह पार्टी सिंबल विवाद पर गुरुवार तक फैसला ना ले। पिछली सुनवाई
के दौरान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा था कि हमारे ऊपर अयोग्यता का आरोप गलत लगाया गया है। हम अभी
भी शिवसैनिक हैं। उधर, सुप्रीम कोर्ट में उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि शिंदे
गुट में जाने वाले विधायक संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता से तभी बच सकते हैं, अगर वो अलग
हुए गुट का किसी अन्य पार्टी में विलय कर देते हैं। उन्होंने कहा था कि उनके बचाव का कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
उद्धव ठाकरे भले ही मुख्यमंत्री नहीं रहे, लेकिन महाराष्ट्र के लोग आज भी उन्हें ही शिवसेना नेता मानते हैं। लोग
उनकी पार्टी को अब 'उद्धव ठाकरे ची शिवसेना कहते हैं जबकि एकनाथ शिंदे के समर्थक 'शिंदे ची शिवसेना बोलते

हैं। इस दौरान पार्टी के चुनाव चिह्न, झंडे, टाइगर के चेहरे और मराठी मानुस के समर्थन के साथ शिवाजी की
विरासत को फिर से हासिल करने के लिए ठाकरे परिवार कोई कोर कसर नहीं छोड़ रह है। ठाकरे परिवार उस
भावना का भी राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहा है कि गुजराती बहुल भाजपा ने एक मराठी का अपमान
करने की कोशिश की है। सत्ता में रहते हुए और सत्ता से बाहर की शिवसेना में अंतर महाराष्ट्र के लोग अच्छी तरह
जानते-पहचानते हैं। किसी भी विषम परिस्थिति में जुझारू शिव सैनिक बारिश आ गर्मी की परवाह किए बिना सड़क
पर उतरते हैं और एयरकंडीशंड कमरों के बजाए सड़क पर संघर्ष करते रहे हैं। शिवसेना के इसी चरित्र को फिर से
जीवित करने के लिए उद्धव के पुत्र आदित्य ठाकरे जनता के बीच उतरे हैं और उन्होंने राज्य भर में लोगों से शिव
संवाद शुरू करने का कार्यक्रम बनाया है। इस बार के शिव संवाद का नजारा बदला हुआ है। हालांकि 2019 में भी
आदित्य ठाकरे ने ऐसा एक अभियान किया था लेकिन उस समय आदित्य ठाकरे को देवेंद्र फडणवीस के मातहत
डिप्टी सीएम के तौर पर तैयार किया जा रहा था और सारा कामकाज पीआर एजेंसियों ने संभाल रखा था, जिसमें
शिवसैनिकों को पीछे की कतार में धकेल दिया गया था। उससे बहुत अच्छी छवि और प्रभाव जनता के बीच नहीं
गया था। लेकिन इस बार सारी कमान शिवसैनिकों के हाथ में है और वही शिव संवाद का प्रबंधन कर रहे हैं।
शिवसेना विपक्ष के तौर पर हमेशा बहुत प्रभावी रही है। सत्ता से सड़क पर संघर्ष करने में शिवसेना माहिर है।
हालांकि महा विकास अघाड़ी सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर उद्धव ठाकरे की काफी सराहना हुई है, लेकिन विपक्ष
के तौर पर स्थितियां एकदम विपरीत हैं। वैसे तो भाजपा नेता भी मानते हैं कि ठाकरे और शिवसेना एक दूसरे के
पर्याय हैं।

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