कहानी: एक आस्था की मौत

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विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

बाबूजी तब कितने उत्साहित रहा करते जब मनीष भैया इम्तिहान के बाद छुट्टियों में घर आते…भैया की पसंदगी
का पूरा-पूरा ख्याल रखते हुए बाबूजी वही कुछ उसे बनाते खिलाते जो भैया पसंद करते.. रिजल्ट खुलते ही पास होने
पर कोई न कोई पूजा-अनुष्ठान अवश्य कराते.. पूजा की तैयारी तीन-चार दिनों पूर्व ही शुरू हो जाती.. बस.. मां के
पीछे ही पड जाते बाबूजी.. कहते-मेरा वो साफा-जेकेट निकाल दो.. वो नया वाला पाजामा निकाल दो.. कोसे का
कुरता निकाल दो.. मां कहती-अभी तो पूजा में दो दिन बाकी है.. अभी से क्या करेंगे? तब बाबूजी कहते-अरी

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भागवान.. ये भी तो देखना है कि कहीं पड़े-पड़े सड तो नहीं गए? दीमकों ने तो नहीं काट खाया?.. सलवटें तो नहीं
पड गई?.. जिद कर अपना साफा-जेकेट निकलवाकर ही दम लेते..
फिर दो दिनों के अन्दर मोहल्ले के घर-घर जाकर कहते-देखो मेरे मनीष ने ये कर लिया.. मेरे मनीष ने वो कर
लिया…. पूजा के लिए सगे-सम्बन्धियों, पड़ोसियों को नियत समय पर घर आने को न्यौत आते.. तब उनके साथ
मुझे पड़ोस के घर-घर जाना बेहद अच्छा लगता था.. जिन पड़ोसियों से अक्सर डांट मिलती थी, वही तब बाबूजी के
साथ होने पर स्नेह जताते..
शुरू से घर का वातावरण मंदिर सा था.. पूजा-पाठ में बाबूजी की विशेष दिलचस्पी थी.. मौके-बेमौके ये सब कराने में
उन्हें एक आत्मिक संतुष्टि मिलती.. बचपन से लेकर अब तक न मालूम इन आंखों ने कितने अनुष्ठान, हवन, और
पूजा-पाठ देखे और हर वक्त पाया कि बाबूजी इन क्षनों में ही चरम सुख की अनुभूति करते.. मनीष भैया मेट्रिक
तक यहीं पढ़े और तब तक उनका पूजा-पाठ बराबर चलता रहा.. भैया भी पूरी लगन और आस्था से उनका हाथ
बटाते .. उनका साथ देते.. उनको पूजा-पाठ की सारी सामग्रियां कंठस्थ याद रहते.. पंडितजी को लाने से लेकर
प्रसाद बांटने तक का काम वे पूरे मनोयोग से करते.. पूजा की वेदी पर हमेशा बाबूजी ही बैठते.. वो भी पूरे सज-धज
के साथ .. कुरता, पाजामा, जेकेट और सफेद साफे के साथ..
बाबूजी का विशेष स्नेह आरम्भ से मनीष भैया के प्रति था.. मुझे हर एक छोटी-बड़ी गलतियों पर गाली पड़ती…मार
पड़ती…जबकि मनीष भैया बड़ी से बड़ी भी गलती करते तो बाबूजी नजरअंदाज कर देते.. उन्हें एक शब्द भी नहीं
कहते.. कभी-कभी इस सौतेले व्यवहार पर दुःख होता लेकिन मां इस कमी को पूरा कर देती.. मां का अनुराग मुझसे
काफी था..
मेट्रिक के आगे की पढ़ाई के लिए भैया जबलपुर चले गए.. उनके जाने के बाद घर एकदम ही नीरस और वीरान सा
हो गया.. बाबूजी अक्सर खोये-खोये रहते.. हर पल उन्हें याद करते.. फिर समय गुजरता गया.. धीरे-धीरे सब
सामान्य होता गया.. उनका स्नेह मुझ पर केन्द्रित होता गया.. तब बगैर कुछ बोले उन्होंने मेरे लिए एक नई
सायकल खरीद दी.. कुछ नए कपडे भी सिलवा दिए.. न मालूम कैसे उन्हें पता चल गया कि मुझे गाने सुनने का
बेहद शौक है, उन्होंने बिना बताये एक टेप रिकार्डर भी खरीद दिया.. अब हरेक बात पर वे मेरी राय लेते.. मुझसे
मशविरा लेते.. लेकिन एक भी दिन ऐसा नहीं बीतता कि बाबूजी मनीष भैया को याद न करते.. भोजन के बाद रात
को भैया की बात निकलती तो देर रात तक चलती.. कभी एक बज जाते तो कभी दो.. उनका पत्र आते ही बाबूजी
झूम से जाते.. घूम-घूम कर परिचितों को दिखाते.. उनकी हर संभव-असंभव जरूरतें पूरी करते.. इम्तिहान के बाद
भैया घर लौटते.. रिजल्ट आता तो फिर वही बाबूजी का ढर्रा शुरू हो जाता…पूजा-पाठ.. हवन.. अनुष्ठान.. आदि..
आदि..
पढ़ाई खत्म होते ही भैया की सर्विस लग गई.. इसे भी बाबूजी पूजा-पाठ और ईश्वर पर अगाध प्रेम का ही फल
मानते.. नहीं तो लोग फूड आफिसर के लिए हजारों रूपये फूंक देते हैं फिर भी सर्विस नहीं लगती.. आज भी वह
शुभ दिन याद है जब बाबूजी ने सर्विस की खबर मिलते ही घर में एक भारी अनुष्ठान करवाया.. उसी दिन एक शुभ
संयोग ये हुआ कि बैतूल में एक रिटायर्ड हेडमास्टर की लड़की के साथ उनकी शादी भी पक्की हो गई .. बाबूजी
असाधारण तौर पर उत्साहित थे.. जीवन भर की जमा-पूंजी लगाकर उन्होंने आनन्-फानन में धूमधाम से शादी

संपन्न करा दी .. भैया की पहली पोस्टिंग सागर में हुई.. भाभी को लेकर वे तुरंत ही सागर चले गए.. घर एक बार
फिर घर सूना और नीरस हो गया..
साल पर साल बीतते गए.. भैया सागर से रीवां.. धार.. झाबुआ.. छतरपुर.. टीकमगढ़ ट्रांसफर होते रहे.. इस बीच वे
तीन बच्चों के बाप बन गए.. पहले की अपेक्षा उनके खत आने कम हो गए.. बाबूजी कभी लिखते तो जवाब में
मनीआर्डर आ जाता.. साथ में सन्देश के स्थान पर एक या दो लाईनों का आधा-अधूरा पत्र.. बाबूजी आहत हो जाते
फिर भी दिल को तसल्ली देते कहते दृ अरे.. कामकाज ज्यादा रहता होगा इसलिए नहीं लिख पाता होगा.. और फिर
बच्चों की जिम्मेदारी भी तो रहती है.. आठ-नौ सालों में भैया केवल आठ या नौ बार ही घर आये.. और हर बार
एक या दो दिनों से ज्यादा नहीं रुके.. कभी ज्यादा काम होने का हवाला देकर तो कभी बच्चों की पढ़ाई के नुकसान
की बातें कर निकल जाते.. बाबूजी अक्सर कहते कि मनीष का ट्रांसफर यहीं हो जाता तो सब एक साथ आनंद से
रहते.. वे प्रयास भी करते.. स्थानीय नेताओं से इस बाबत बात भी करते.. कई बार मां से भी कहा कि मनीष का
ट्रांसफर यहां हो जाए तो सत्यनारायण की कथा करवाएंगे.. उनका प्रयास विफल नहीं हुआ.. आखिरकार भैया का
ट्रांसफर यहीं हो गया..
चार-पांच दिन पहले ही भैया-भाभी और बच्चे माल-असबाब के साथ यहां शिफ्ट हुए .. दो ट्रक सामान देख मां फूली
न समाई.. सोफा.. पलंग. अलमारी.. ड्रेसिंग टेबल.. डायनिग टेबल.. पंखा.. फ्रिज.. टी.. वी…स्कूटर.. और ढेर सारे
तरह-तरह के बर्तन.. सभी कुछ तो था.. मां गिन-गिनकर बड़े उत्साह से सामान उतरवा रही थी और बाबूजी विचित्र
निगाहों से यह सब घूरते रहे…सत्यनारायण की कथा कराने की बात जब उन्होंने भैया से की तो भैया अन्यमनस्क
सा केवल सिर हिला दिए.. बाबूजी को भैया का यूं इस प्रकार टालने के अंदाज में हामी भरना कुछ अच्छा नहीं
लगा.. वे मन मसोस कर रह गए.. कुछ नहीं बोले.. पूजा के एक दिन पूर्व नगर के व्यापारीगण बोरी-बोरी शक्कर,
गेहूं व अन्य पूजा की सामग्री घर में ठेलते रहे.. बाबूजी अजीब नजरों से सब देखते रहे.. उन्हें अटपटा सा महसूस
हुआ.. पर चाहकर भी वे विरोध दर्ज न कर पाए.. वे लोग जो कभी सीधे मुंह बात तक नहीं करते थे, उस दिन
बगैर किसी बात के ही बाबूजी से बतियाने की कोशिश में थे.. उन्होंने मां से यह सब कहा भी लेकिन मां तो किसी
और दुनिया में ही खोई थी.. उसने बाबूजी की बातें अनसुनी कर दी..
आज पूजा का दिन है…. सुबह-सुबह ही बाबूजी सब बातें भूलकर पहले की भांति पूजा-पाठ को लेकर काफी उत्साहित
और प्रसन्न हैं.. पहले की तरह ही सगे-सम्बन्धियों और पड़ोसियों को न्यौतने घर से निकल ही रहे थे कि मनीष
भैया ने पूछ लिया.. उद्देश्य जानते ही वे गरम हो गए.. उनका यह रवैया मुझे भी बुरा लगा.. भैया ने तब कहा था
कि पड़ोसियों को न्यौतने मेरे आफिस का नौकर चला जाएगा.. आपका जाना ठीक नहीं.. आपको मेरे स्टेटस का
थोडा तो ख्याल रखना चाहिए.. यह सब सुन बाबूजी काफी विचलित हुए पर बिना कोई प्रतिवाद के चुपचाप उलटे
पांव अपने कमरे में लौट गए.. पूरे दिन घर में भाग-दौड़ मची रही.. मां इस कमरे से उस कमरे दौड़ती रही.. घर के
लोगों पर चीखती रही-चिल्लाती रही.. पूजा-पाठ की सामग्री इधर से उधर जमाती रही.. भाभी अपने बच्चों को
सजाने-संवारने में व्यस्त रही.. और भैया जो हमेशा बाबूजी के इर्द-गिर्द रहते.. ये लाओ.. वो लाओ करते, वो अपने
व्यापारिक रिश्तों के माहौल में घिरे रहे.. बाबूजी वैसे तो सामान्य दिखने की कोशिश में रहे पर चाहकर भी उस
उत्साह में नहीं डूब पाये जैसा पहले डूबा करते.. अधिकांश समय वे कमरे में ही बन्द रहे..
पूजा आरम्भ होते ही इस बार अपरिचित चेहरों की भीड़ लग गई.. पुराने चहरे भी थे पर बहुत ही कम.. नौकर ने
किस-किस को न्यौता दिया, समझ ही नहीं आया.. बाबूजी के कोई दोस्त नजर नहीं आये.. न सक्सेनाजी दिखे न

ही गुप्ताजी… न टीकम अंकल दिखे न धोटे अंकल.. न ही पाटन वाली काकी दिखी न पड़ोस की बिंदा बुआ.. पहले
की तरह माहौल ही न था.. सब अटपटा-अटपटा सा लग रहा था.. बाबूजी ये सब देख कितने दुखी होंगे.. यही सब
सोचते पूजा की वेदी में बैठने के लिए बाबूजी को बुलाने मेरे कदम अनायास ही कमरे की ओर बढ गए.. मेरे प्रवेश
करते ही आहट से वे चैंक जाते हैं.. तुरंत ही चेहरा पीछे कर चश्मा निकाल आंखों पर धोती फिराते धीमी आवाज में
कहते हैं.. चलो आ रहा हूं.. फिर चश्मा ठीक करते साफा-जेकेट पहन बाहर निकलते हैं.. कमरे के बाहर निकलते ही
देखते हैं कि दूर ड्राइंग हाल में भीड़ के बीचों-बीच मनीष भैया और भाभी पूजा की वेदी पर बैठ रहे.. मैं भी ये दृश्य
देख हतप्रभ रह जाता हूं.. पीछे घूम बाबूजी को देखता हूं.. वे भी वही सब देख रहे.. इसके पूर्व कि मैं कुछ कहता
बाबूजी चश्मा उतार अपनी आंखों को पोंछते एकदम ही धीमी आवाज में साफा उतारते बोले-बेटा.. बड़ी गर्मी है
आज.. जा.. इसे रख आ. इसकी जरुरत नहीं.. और सुन.. ये जेकेट भी रख दे.. और वे मुझसे आंखे चुराते फिर से
चश्मा चढाते दूर एक कोने में बैठे किसी रिश्तेदार के पास वाली कुर्सी में धम्म से बैठ जाते हैं….

कविता
राजा-रानी की कहानी
-अशोक गुजराती-
एक था राजा
उसकी थीं चार रानियां
और अनगिनत दासियां
प्रेम तो सबसे प्रदर्शित करता
एक से था कुछ ज्यादा ही लगाव
उसकी यह रानी
थी उसी के धर्म की
वह उसे थी अत्यधिक प्रिय
शेष को निबाह ही रहा था वह
दूसरी रानी थी सुंदर
थी वह पड़ोसी मुल्क के मजहब की
उसकी मजबूरी
अल्पसंख्यकों को खुश रखने की
तीसरी थी उसीके राज्य की
जिसको एक गुरु ने कर दिया था
अन्य धर्म में परिवर्तित
मुश्किल वक्त में दुश्मनों से
लड़ने की खातिर
चैथी का क्या कहना

विदेशियों ने गरीबों को अपने
धर्म का देकर सहारा
बना लिया था अपना
ऐसा था वह राजा
करता था जो अपने मन की ही बात
रहता कोशिश में
बनी रहें वे सारी दासियां पटरानियां ही
उसकी चहेती महारानी की
सफल भी हो रहा था
वह पुराना फेरी वाला
सीख ली थीं दो खासियतें
गणित मुनाफे का
दूजे-ले लो मेरा माल
जो है सबसे बढ़िया
फेरी लगाते-लगाते बन गया
एक सूबे का मुखिया
किसी ह……. की तरह
बोलता रहता लगातार
अपनी वस्तु को
भुनाने का विशेषज्ञ
यही भाषणबाजी गयी उसके पक्ष में
साथ लेकर उसकी अति महत्वाकांक्षा
अपने धर्म पर कुर्बान हो जाने की
उसकी चेमगोइयां
बन गया वह देश का राजा
बढ़ गया उसका वर्चस्ववाद
आ गया अब वह खुल कर सामने
लादने लगा अपनी प्रजा पर
औरंगजेब की मानिन्द
अपने संस्कारित सारे प्रवाद
हौले से सूझबूझ के साथ
सहयोगियों के माध्यम से
जारी करने लगा वह फरमान
कि अब तो मैं ही हूं
सर्व-शक्तिमान…
लोगो, मैं कहूंगा वही सब तुमको करना है
वही पहनो, वही खाओ, वही गाओ
और तो और वही पढ़ो-लिखो

जो मेरे धर्म को है मंज़ूर
वही है तुम्हारा भी धर्म
कहीं यह संकेत तो नहीं
आपात् काल की घोषणा
की भयंकरता की तरफ?
मैं एक अदना-सा कवि
जिसके पास न कोई बड़ा पुरस्कार
लौटाने हेतु
कर ही क्या सकता हूं सिवा
आह्वान उन तमाम पटरानियों, दासियों
उनके पुत्र-पुत्रियों से-
करें स्वयं को मजबूत
करें विरोध
किसी भी धर्म-परायण की कट्टरता का
अपने मौलिक धर्म को रखें याद
है वह इनसानियत का
बाकी सब फिजूल
कर लें संकल्प
छाया राष्ट्र पर यह धर्मांधता का संकट
जायेगा टल निश्चित ही
इतिहास गवाह है
अधिनायकत्व रहा सदा
सीमित समय तक
जनता ने उसे हरदम
फेंका है उखाड़!

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