रोहिंग्याओं के प्रति इतना लाड़-दुलार क्यों?

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विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

क्या रोहिंग्या घुसपैठियों के मुद्दे पर मोदी सरकार के रुख में नरमी आ रही है? पिछले हफ्ते केन्द्रीय आवास और
शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी के एक ट्वीट को लेकर काफी बवाल मचा। गृह मंत्रालय ने सफाई दी लेकिन
लोग पूरी आश्वस्त नहीं हुए। सवाल उठ रहे हैं। नाराजगी भी है। कटाक्ष किए गए- ‘आग नहीं होती तो धुआं कहां से
उठा?’ खबर है कि संघ और विहिप दोनों, पुरी के फैसले से नाराज हैं। भाजपा सफाई देती दिखी। रोहिंग्या
घुसपैठियों को फ्लैट दिए जाने के विवाद के लिए भाजपा ने दिल्ली की केजरीवाल सरकार को जिम्मेदार ठहराया।
तथ्य यह है कि रोहिंग्या को शिफ्ट करने का प्रस्ताव दिल्ली सरकार ने पहले रखा था। बवाल मचते ही आम
आदमी पार्टी के नेता केंद्र सरकार पर दोष मढऩे लगे। आपियों ने यह संदेश फैलाने पर जोर लगा दिया कि भाजपा
और मोदी सरकार की करनी और कथनी में अंतर है। आम आदमी पार्टी के सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि
‘भाजपा ही रोहिंग्या को ला और बसा रही है।‘ उधर, भाजपाइयों का दावा है कि आम आदमी पार्टी के लोग वोट बैंक
बनाने के लिए घुसपैठियों को संरक्षण देते रहे हैं। विवाद की शुरूआत पुरी के जिस ट्वीट से हुई उसमें टैग की गई

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मीडिया रिपोर्ट में रोहिंग्या घुसपैठियों को ईडब्ल्यूएस फ्लैट में शिफ्ट करने और उन्हें मूलभूत सुविधाओं के साथ
पुलिस सुरक्षा मुहैया कराने का दावा किया गया था। सुबह साढ़े सात बजे किए गए ट्वीट को लेकर लोगों में इतनी
नाराजगी बढ़ी की चार-पांच घंटे बाद ही गृह मंत्रालय को स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा। गृह मंत्रालय ने रोहिंग्या
घुसपैठियों को फ्लैट दिए जाने की खबर को खारिज कर दिया। कहा गया कि ‘रोहिंग्या घुसपैठियों को मौजूदा
स्थान-कंचन कुंज में ही रखा जाए। उन्हें वापस भेजने के लिए म्यांमार सरकार से बात चल रही है।‘
रोहिंग्या मुसलमानों की भारत में घुसपैठ के मुद्दे पर भाजपा और मोदी सरकार का दृष्टिकोण अबतक स्पष्ट रहा
है। तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं में इन घुसपैठियों के प्रति सहानुभूति अवश्य दिखाई देती
रही है। भाजपा का जोर इस बात पर रहा है कि रोहिंग्या शरणार्थी नहीं है, ये घुसपैठिये हैं, अत: विधिवत प्रक्रिया
पूरी होने पर उन्हें उनके देश लौटना होगा। रोहिंग्या हमारी सुरक्षा के लिए खतरा साबित हो सकते हैं। देश में इस
समय लगभग चालीस हजार रोहिंग्या घुसपैठिये मौजूद होने का अनुमान है। ये बांग्लादेश और म्यांमार से लगी
सीमा के जंगलों से होकर भारत में प्रवेश कर देश के विभिन्न भागों में फैलते जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि
रोहिंग्या मुसलमान घुसपैठियों को भारत में बसाने के लिए विवादित संगठन पीएफआई और कुछ राष्ट्र विरोधी
ताकतें बड़ी भूमिका अदा कर रहीं हैं। पश्चिम बंगाल के अलावा नेपाल से लगे भारतीय जिलों, दिल्ली, कर्नाटक और
जम्मू-कश्मीर में इनकी संख्या बढ़ रही है। घुसपैठियों के संबंध पाकिस्तान और बांग्लादेश में सक्रिय भारत विरोधी
आतंकवादी संगठनों से होना बताया जाता है। सरकार ने लगभग एक साल पहले लोकसभा में एक लिखित जवाब में
माना था कि अवैध प्रवासी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। बीएसएफ और असम रायफल्स को एडवाइजरी जारी कर
कहा गया है कि घुसपैठ रोकने अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कड़ी नजर रखी जाए। एडवाइजरी के बाद भी हो क्या रहा है?
यह एक कटु सत्य है कि बांग्लादेश से घुसपैठ पर सौ फीसदी रोक संभव नहीं हो पाई। मिजोरम के मुख्यमंत्री ने
स्वीकार किया है कि म्यांमार से लगी 510 किेमी लंबी बिना बाड़ की सीमा से घुस आए रोहिंग्या मुसलमानों की
संख्या मिजोरम में बाइस हजार से ज्यादा हो चुकी है। मुस्लिम बहुल बांग्लादेश तक अब रोहिंग्या शरणार्थियों को
बोझ ढोते-ढोते थक चुका है। आपराधिक गतिविधियों में इनकी संलिप्तता से नाराजगी बढ़ रही है। मुस्लिम बहुल
इंडोनेशिया भी इन्हें रखना नहीं चाहता। ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत और बांग्लादेश सहित 6 एशियाई देश
रोहिंग्याओं से परेशान हैं।
भारत के समक्ष दो गंभीर चुनौतियां हैं। एक तो हम रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों की घुसपैठ नहीं रोक पा रहे,
दूसरी- भारत में घुसपैठियों के हमदर्दोँ ने समस्या को जटिल बना दिया है। रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति पश्चिम
बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का स्नेह जगजाहिर है। 2017 में उनका एक ट्वीट काफी चर्चित हुआ था।
ममता ने कहा था कि हम रोहिंग्या को आम इंसान मानते हैं वो आतंकवादी नहीं हैं। केन्द्र की नरेंद्र मोदी सरकार
के दृष्टिकोण से अलग उन्होंने रोहिंग्या की मदद के लिए राष्ट्रसंघ की अपील का समर्थन किया था। 2018 में
बीएसएफ के महानिदेशक के.के. शर्मा ने कहा था कि हमने रोहिंग्या मुसलमानों की घुसपैठ काफी हद तक नियंत्रित
कर ली है लेकिन असली समस्या भारत में घुस चुके रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर है। अधिकांश रोहिंग्या पश्चिम
बंगाल में बस गए हैं क्योंकि वहां की राज्य सरकार उनका समर्थन कर रही है। याद करें, कई बरस पहले महाराष्ट्र
से बांग्लादेशियों को बाहर निकालने के लिए तत्कालीन शिवसेना सरकार ने कड़ाई शुरू की थी उस समय भी ममता
बनर्जी ने इसका विरोध किया था। रोहिंग्या घुसपैठियों और बांग्लादेशियों के हमदर्द पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं
हैं। मुंबई, दिल्ली और यूपी के कुछ इलाकों में भी ये मौजूद बताये जाते हैं। चर्चित वकील प्रशांत भूषण के माध्यम
से सलीमुल्लाह नामक एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट याचिका दायर कर मांग की थी कि जम्मू-कश्मीर के डिटेंशन
सेंटर में रखें गए रोहिंग्याओं को म्यांमार वापस भेजने के केंद्र सरकार के निर्णय पर रोक लगाई जाए। इस पर
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बगैर रोहिंग्याओं को वापस म्यांमार नहीं भेजें।

साफ है कि रोहिंग्याओ की घुसपैठ का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस काम में ऐसे गिरोह सक्रिय
बताये जाते हैं जो रोहिंग्याओं की घुसपैठ कराने और भारत के विभिन्न भागों पहुंचाने का काम करते हैं। पकड़े जा
चुके कई रोहिंग्याओं के पास आधार कार्ड होने की बात सामने आई है। संभव है कि बड़ी संख्या में रोहिंग्याओं के
नाम मतदाता सूचियों में भी दर्ज करवा दिये गए हों। वोट के भूखे राजनेता मानवता के नाम पर घुसपैठियों की
हिम्मत बढ़ाएं और कट्टरपंथी ताकतें उन्हें संरक्षण दें तो भविष्य में खतरे की आशंकाएं स्वाभाविक हैं। सवाल यह है
कि आखिर किस सूचना के आधार पर हरदीप सिंह पुरी ने बखेड़ा खड़ा कर देने वाला ट्वीट किया था। इसकी
बारीकी से जांच होनी चाहिए। यह एक ऐसी गफलत थी जिसके कारण केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों
की छवि पर प्रभाव पडऩे की आशंका हो गई। सोशल मीडिया पर किसी ने कटाक्ष किया था- ‘क्या मोदी सरकार
रोहिंग्या घुसपैठियों को फ्लैट देकर यू.एन. हाई कमीशन फॉर रिफ्यूजी की लल्लो-चप्पो कर रही है?’ आम आदमी
पार्टी के एक नेता ने डिबेट के दौरान कहा- ‘मोदी जी की नजर नोबल पुरस्कार पर है।‘ इन कटाक्षों का कोई ठोस
आधार समझ नहीं आता। विशुद्ध राजनीतिक विरोध या ईर्ष्या जरूर महसूस की गई। यह स्पष्ट करना उचित होगा
कि भारत ने 1951 के रिफ्यूजी कन्वेंशन और 1967 के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं लेकिन उसने 1982 के
कन्वेंशन अगेंस्ट टार्चर पर हस्ताक्षर किए हैं जिसके अनुसार किसी व्यक्ति को निष्कासित, प्रत्यावर्तित या वापस
उसके देश नहीं भेजा जा सकता है जहां उसको यातना दिए जाने की आशंका हो। रोहिंग्या को वापस भेजने में
सम्भवत: यही एक बड़ी अड़चन है। फिर भी रास्ता तो खोजना ही होगा। सहृदयता के नाम पर देश की स्थिति खुले
चारागाह जैसी नहीं रहने दी जा सकती है। घुसपैठियों के कारण सुरक्षा के लिए खतरा और संसाधनों पर बोझ बढऩा
तय मानना चाहिए।

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