न्याय व्यवस्था को प्रभावित करना है अपराधियों के पक्ष में शक्ति प्रदर्शन व उनका महिमामंडन

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विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

भारत के विश्व गुरु बनने के दावों के बीच हमारे देश में दुर्भाग्यवश एक नया चलन शुरू हो गया है। इसके अंतर्गत
जाति, समुदाय व धर्म के आधार पर अपराधियों के पक्ष में जनसमर्थन जुटाते देखा जा रहा है। अपराधियों के पक्ष
में किसी न किसी तरह का तर्क व कुतर्क गढ़कर अपराधियों की हौसला अफ़ज़ाई की जा रही है। सज़ायाफ़्ता
अपराधियों के पक्ष में अनेक अख़बारों में आलेख प्रकाशित किये जा रहे हैं। धर्म विशेष, कथित उच्च जाति व दबंग
क़िस्म के लोगों के समर्थन में प्रदर्शन, पंचायतें व रैलियां आयोजित की जा रही हैं। यहां यह कहने की ज़रुरत नहीं
कि जहां जहां इसतरह की दुर्भाग्यपूर्ण व अन्यायपूर्ण घटनायें हो रही हैं उनमें राजनीति व राजनेताओं का खुला हाथ
है। राजनैतिक लोग न्याय-अन्याय देखने के बजाये अपने 'वोट बैंक' के नफ़े नुक़्सान के मद्देनज़र इसतरह के
गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं। यह उसी भारतवर्ष में हो रहा है जहाँ के बच्चे दशकों से 'इंसाफ़ की डगर पे -बच्चों
दिखाओ चल के -यह देश है तुम्हारा नेता तुम्हीं हो कल के' जैसे आदर्श व प्रेरणादायक गीत सुनते आ रहे हैं। यह
उस देश में हो रहा है जहां बलात्कारियों, हत्यारों व अन्य जघन्य क़िस्म के अपराध करने वालों का सामाजिक
बहिष्कार किया जाता था, उनका हुक़्क़ा पानी बंद कर दिया जाता था, लोग ऐसे लोगों से मिलना जुलना व रिश्ते
रखना पसंद नहीं करते थे। परन्तु आज उसी देश में अपराधियों का महिमामंडन किया जा रहा है। ज़ाहिर है इसतरह
की गतिविधियों का जहाँ देश के न्यायप्रिय लोगों द्वारा विरोध किया जा रहा है वहीं विदेशों में भी इसकी चर्चा हो
रही है नतीजतन ऐसी गतिविधियां देश की बदनामी का कारक भी बन रही हैं।
विगत स्वतंत्रता दिवस को जिस तरह गुजरात सरकार द्वारा 11 दंगाई हत्यारों व बलात्कारियों को रिहा किया गया,
उनके समर्थन व हमदर्दी में 'क़सीदे' लिखे गये, मानवता के इन हत्यारों को एक विधायक द्वारा उनकी जाति के
आधार पर उन्हें 'अच्छा संस्कारी' तक बताया गया। गवाहों व साक्ष्यों के आधार पर अदालत द्वारा दी गयी सज़ा का
एक विधायक द्वारा यह कहकर अपमान किया गया कि 'संभव है कि उन्हें फंसाया गया हो, अपराधियों के
महिमामंडन में उन्हें तिलक लगाकर, मिठाई खिलाकर सम्मानित किया गया देश के इतिहास में शायद पहले ऐसा
नहीं देखा गया। जिस बिल्क़ीस का व उसके साथ उसकी मां व अन्य महिलाओं का बलात्कार किया गया जिसकी
तीन वर्षीय बेटी व अन्य कई रिश्तेदारों की हत्या कर दी गयी वह बिल्क़ीस मुसलमान बाद में थी, पहले वह एक
महिला थी। यह उसी समुदाय की महिला थी जिस समुदाय की महिलाओं को तीन तलाक़ जैसी व्यवस्था से मुक्ति
दिलाकर मुस्लिम महिलाओं का हमदर्द जताने की सत्ता द्वारा कोशिश की गयी थी।
गुजरात सरकार के इस अन्याय पूर्ण फ़ैसले की गूंज आख़िरकार अमेरिका तक जा पहुंची। और अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय
धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआरएफ) ने इन 11 हत्यारों व बलात्कारियों की ‘अनुचित’ रिहाई की घोर निंदा
की। आयोग के आयुक्त स्टीफन श्नेक ने यहां तक कहा कि यह रिहाई ‘न्याय का उपहास’ है, और ‘सज़ा से मुक्ति
के उस पैटर्न’ का हिस्सा है, जिसका भारत में अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा के आरोपी लाभ उठाते हैं। उन्होंने कहा, कि
‘2002 के गुजरात दंगों में शारीरिक और यौन हिंसा के अपराधियों को उनके कृत्य के लिए ज़िम्मेदार ठहराने में
विफलता, न्याय का मज़ाक़ भी है। हद तो यह है कि इन 11 लोगों को दोषी ठहराने वाले जस्टिस यूडी साल्वी ने
भी उनकी रिहाई पर सवाल उठाते हुए यह कहा कि दोषियों को रिहाई करने से पहले गुजरात सरकार को अपराधों
की गंभीरता उन्हें दी गई सज़ा तथा पीड़िता के पक्ष को भी ध्यान में रखना चाहिए था।

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जघन्य अपराधियों को सत्ता के समर्थन, उनके पक्ष में धर्म व जाति के आधार पर भीड़ जुटाने और अपराधियों को
महिमामंडित करने का यही चलन 2015 में उस समय दिखाई दिया था जब राजधानी दिल्ली के समीप दादरी में
मोहम्मद अख़लाक़ के हत्यारों के पक्ष में सत्ताधारी नेता व हत्यारों की स्वधर्मी भीड़ इकट्ठी होकर पंचायतें करती
दिखाई दी थी। झारखण्ड में भी यही रवैय्या उस समय देखा गया जब 2017 में हज़ारीबाग से भारतीय जनता पार्टी
के सांसद और केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा जेल से छूटने के बाद मॉब लिंचिंग के 11 अभियुक्तों का माला पहना कर
अभिनंदन करते नज़र आये थे। इसी तरह 6 दिसंबर 2017 को जब शंभू लाल रैगर नामक एक अपराधी द्वारा
अफ़राज़ुल नामक मज़दूर की कुल्हाड़ी से काट कर हत्या की जाती है और उस घटना का लाइव वीडिओ प्रसारित
किया जाता है उस हत्यारे शंभू के पक्ष में भी विशाल जुलूस निकले, अदालत में भगवा ध्वज फहरा दिया गया, यहाँ
तक कि धार्मिक जुलूस में शंभू रैगर की झांकी तक निकाली गयी। कठुआ में आसिफ़ा के बलात्कारियों व हत्यारों के
पक्ष में तो कभी हाथरस में दलित लड़की के बलात्कारियों व हत्यारों के पक्ष में और अब नोएडा में एक महिला से
बदसुलूकी करने वाले एक भाजपाई नेता के पक्ष में भीड़ जुटती दिखाई दी। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का 'शंखनाद'
और बलात्कारियों के साथ सत्ता का रहम-ओ-करम, महिला से बदतमीज़ी व बदसुलूकी करने वाले के साथ जाति के
आधार पर खड़े होना और ऐसे दोषियों व आरोपियों के पक्ष में शक्ति प्रदर्शन करना इसतरह की घटनायें निश्चित
रूप से न्याय व्यवस्था को प्रभावित करने का प्रयास हैं।

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