दवा का काकस

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विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

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भारत में कोरोना वायरस महामारी की पहली और दूसरी लहर के दौरान लोगों को घंटों लाइन में लगकर दवा
खरीदते देखा गया। संक्रमण फैलने के डर के बावजूद भीड़ के बीच जिस दवा को लेने की होड़ मची थी, वह थी
डोलो-650 एमजी की टैबलेट। भारत में तो यह दवा कोरोना वायरस के इलाज का पर्याय बन गई थी। डोलो की
लोकप्रियता का आलम यह था कि सोशल मीडिया तक पर इसको लेकर मीम्स भी बन गए। डोलो की निर्माता
कंपनी माइक्रो लैब्स को इसकी बिक्री से जबरदस्त फायदा हुआ। हालांकि, 2022 की शुरुआत में कोरोना लहरों के
छंटने के बाद जब जांच एजेंसियां फिर से सक्रिय हुईं तो डोलो बनाने वाली कंपनी भी टैक्स में हेराफेरी के मामलों
में घिर गई। आरोप लगा है कि माइक्रोलैब्स ने डॉक्टरों को एक हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा के मुफ्त उपहार
बांटे, ताकि वे मरीजों को डोलो-650 एमजी दवा लेने की सलाह दें। डोलो की निर्माता कंपनी पर लगे इन आरोपों से
मामले की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ खुद भी चौंक गए। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि
उन्होंने खुद भी यह दवा ली है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दायर नई याचिका के बाद कंपनी की दिक्कतें
बढऩी तय हैं, जिसका इलाज किसी भी गोली में नहीं है। फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन
की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि इस तरह के मामलों में रिश्वत के लिए डॉक्टरों पर तो केस चलता
है, पर दवा कंपनियां बच जाती हैं। याचिका में डॉक्टरों को तोहफे देने वाली दवा कंपनियों की जवाबदेही भी तय
किए जाने की मांग की गई। याचिका में कहा गया है कि फार्मास्यूटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज के लिए यूनिफॉर्म कोड
बनाने की जरूरत है। इसके ना होने के चलते मरीजों को ब्रांडेड कंपनियों की बहुत ज्यादा कीमत वाली दवाई
खरीदनी पड़ती है, क्योंकि अक्सर उनका इलाज करने वाले डॉक्टर महंगे गिफ्ट के लालच में मरीजों को वही दवाई
पर्चे पर लिखते हैं। बहरहाल, देश में उस समय दवा की बिक्री को लेकर जिस तरह का माहौल तैयार किया गया,
वह सही नहीं है। दवा की एक-एक खुराक के लिए तरस कर मर गए लोगों के साथ यह अन्याय था। माना कि
सभी कंपनियों का एक मात्र उद्देश्य कमाई होता है, मगर समय, काल और परिस्थिति भी मायने रखती है। देश में
डोलो का कारोबार इसलिए फैला क्योंकि कोरोना के दौर में बढ़ती मांग के बीच पैरासिटामॉल बनाने वाली अधिकतर
कंपनियां दवा की आपूर्ति करने में सक्षम नहीं हो पाईं जबकि डोलो-650 सभी जगह उपलब्ध रही। सीबीडीटी ने इसी
कड़ी में आरोप लगाए हैं कि डोलो के निर्माताओं की तरफ से अपनी दवा की जबरदस्त मार्केटिंग और इसका

प्रिस्क्रिप्शन तय कराने के लिए डॉक्टरों को 1,000 करोड़ रुपये के गिफ्ट दिए गए। इसी वजह से डोलो-650 पूरे
कोरोनाकाल और इसके बाद भी लोगों के बीच लोकप्रिय रही। भारत में औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) के
तहत एक फिक्स फॉर्मूले से बनी आवश्यक दवाओं की कीमतें आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत तय कर दी जाती
हैं। यानी कोई भी कंपनी इस कानून के तहत तय की गईं दवाओं की कीमतों को अपनी तरफ से नहीं बढ़ा सकतीं।
जाहिर तौर पर यह एक बड़ी समस्या है। पैरासिटामॉल की 500 मिलीग्राम की टैबलेट की कीमतें औषधि मूल्य
नियंत्रण आदेश के तहत सीमित रखी गई हैं। लेकिन इसी दवा की 650 मिलीग्राम की टैबलेट पर डीपीसीओ का
नियंत्रण नहीं है। बल्कि दवा कंपनियां 500 एमजी से ऊपर की दवाओं की कीमत खुद ही तय कर सकती हैं। यहीं
पर माइक्रोलैब्स जैसी कंपनियों को अपनी डोलो-650 एमजी की कीमत ज्यादा तय करने का मौका मिल गया।
जाहिर तौर पर यह एक बड़ी समस्या है। अनुमानों के आधार पर भारत में मौजूदा समय में 80 फीसदी से ज्यादा
दवाएं प्राइस कंट्रोल (डीपीसीओ) से बाहर हैं।

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