सेवाओं के नियंत्रण को लेकर दिल्ली-केंद्र के बीच विवाद से जुड़ी याचिका पर संविधान पीठ करेगी सुनवाई

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विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

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नई दिल्ली, 22 अगस्त भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) एन. वी. रमण ने सोमवार को कहा कि
उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी में सेवाओं के नियंत्रण को लेकर केंद्र तथा दिल्ली सरकार की विधायी एवं कार्यकारी
शक्तियों के दायरे से संबंधित कानूनी मुद्दों पर सुनवाई करने के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ का गठन किया
है।
सीजेआई ने कहा कि न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ केंद्र तथा दिल्ली सरकार के बीच विवाद
पर सुनवाई करेगी। एक वकील ने न्यायमूर्ति रमण, न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति सी. टी. रविकुमार की
पीठ के समक्ष इस मामले का उल्लेख किया था।
शीर्ष न्यायालय ने छह मई को दिल्ली में सेवाओं के नियंत्रण का मुद्दा पांच-सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजा
था।
प्रधान न्यायाधीश ने तब कहा था, ‘‘संविधान के प्रावधानों और संविधान के अनुच्छेद 239एए (जो दिल्ली की
शक्तियों से संबंधित है) के अधीन और संविधान पीठ के फैसले (2018 के) पर विचार करते हुए, ऐसा प्रतीत होता
है कि इस पीठ के समक्ष एक लंबित मुद्दे को छोड़कर सभी मुद्दों का पूर्ण रूप से निपटारा किया गया है। इसलिए
हमें नहीं लगता कि जिन मुद्दों का निपटारा हो चुका है, उन पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।’’
पीठ ने कहा था, ‘‘इस न्यायालय की संविधान पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 239एए की व्याख्या करते हुए इस
विवाद पर विशेष रूप से कोई टिप्पणी नहीं की, इसलिए संविधान पीठ द्वारा इस मामले पर एक आधिकारिक
फैसले के लिए उपरोक्त मामले को उसके पास भेजना उचित होगा।’’

केंद्र सरकार ने सेवाओं के नियंत्रण और संशोधित जीएनसीटीडी अधिनियम, 2021 की संवैधानिक वैधता को चुनौती
देने वाली दिल्ली सरकार की दो अलग-अलग याचिकाओं पर संयुक्त रूप से सुनवाई करने का अनुरोध किया था।
जीएनसीटीडी अधिनियम में उपराज्यपाल को कथित तौर पर अधिक शक्तियां प्रदान की गयी है।
यह याचिका 14 फरवरी 2019 के उस खंडित फैसले को ध्यान में रखते हुए दायर की गयी है, जिसमें न्यायमूर्ति ए.
के. सीकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण (अब दोनों सेवानिवृत्त) की पीठ ने भारत के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश
को उनके विभाजित फैसले के मद्देनजर राष्ट्रीय राजधानी में सेवाओं के नियंत्रण के मुद्दे पर अंतिम फैसला लेने के
लिए तीन-सदस्यीय पीठ के गठन की सिफारिश की थी।
न्यायमूर्ति भूषण ने तब कहा था कि दिल्ली सरकार के पास प्रशासनिक सेवाओं पर कोई अधिकार नहीं हैं। हालांकि,
न्यायमूर्ति सीकरी की राय उनसे अलग थी।

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