भूस्खलन की बढ़ती घटनाएं चिंता का विषय

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विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

हिमाचल प्रदेश का अधिकांश भाग पहाड़ी क्षेत्र के अंतर्गत आता है। गगनचुंबी पर्वतमाला, कर्मठ जनमानस की भूमि,
नदियां, नाले, झरने यहां पर आने वाले हर व्यक्ति का मन मोह लेते हैं। बरसात के मौसम में इस पवित्र धरा पर
अनेकों धार्मिक यात्राओं पर भी श्रद्धालुओं की आस्था बनी रहती है। किन्नर कैलाश यात्रा, मणिमहेश यात्रा, हिमाचल
प्रदेश के शक्तिपीठ नैना माता, ज्वाला जी, चिंतपूर्णी माता, ब्रजेश्वरी माता, चामुंडा माता तथा पितांबरी बगलामुखी
माता के दर्शन करने बाहरी राज्यों तथा विदेशों से भी श्रद्धालु सावन के महीने में बड़ी संख्या में मंदिरों में पहुंचते
हैं। इन पवित्र स्थलों की यात्रा तथा हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक सुंदरता को निहारने के लिए श्रद्धालुओं को समय-
समय पर इस पहाड़ी प्रदेश की यात्रा के लिए अनेकों दिशा-निर्देश दिए जाते हैं। लेकिन आज का युवा नियमों-कानूनों
से ऊपर उठकर अपने जज्बातों को तवज्जो देकर अपने जीवनयापन को जीना चाहता है। इसके परिणाम अत्यंत
मार्मिक तथा भयावह परिस्थितियों को उजागर कर रहे हैं। हाल ही में ऊना जिले में बाबा गरीबनाथ मंदिर के पास
गोविंद सागर झील में पंजाब के 11 युवक झील में नहाने के लिए उतरे जिसमें से 7 की मृत्यु हो गई तथा चार

अपनी जान को बचाने में कामयाब रहे। इसके अलावा अनेकों युवा पर्यटकों ने रोड में लापरवाही से ड्राइविंग करते
हुए तथा व्यास नदी में सेल्फी के चक्कर में भी अपनी जीवन लीला को समाप्त कर रहे हैं।
कभी बाहरी राज्यों से आए युवा दुर्गम ट्रैकिंग क्षेत्रों में गुमनाम हो रहे हैं, तो कभी सडक़ दुर्घटनाओं में जवानी खो
रहे है। ऐसे में अभिभावकों के लिए भी आज के युवाओं की यात्राएं चिंता का विषय बनी हुई हैं। हिमाचल प्रदेश में
यात्रा करते समय जुलाई से सितंबर के महीने गंभीरता से लेने वाले होते हैं। इन महीनों में इस प्रदेश में बरसात पूरे
ऊफान पर होती है। निश्चित तौर पर बरसात के इन महीनों में प्रदेश के पहाड़ों, झरनों, नदियों, नालों, पर्वतों की
सुंदरता अत्यंत मार्मिक तथा दिल को मोह लेने वाली होती है। लेकिन हिमाचल प्रदेश का सडक़ मार्ग भी इन्हीं
पहाड़ों को चीर कर बनाया गया है जिसमें बरसात के दिनों में भूस्खलन की अत्याधिक संभावनाएं रहती हैं। वर्तमान
समय में मौसम विभाग सटीक जानकारियां देने के काफी करीब पहुंच चुका है। ऐसे में यात्रियों को जब प्रशासन
तथा मौसम विभाग द्वारा अनेकों दिशा-निर्देश दिए जाते हैं तो यात्रियों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि अपने
जीवन को जोखिम में न डालकर हाई अलर्ट के समय प्रदेश की यात्रा न करें। दूसरी सबसे बड़ी समस्या हिमाचल
प्रदेश के लोगों द्वारा पहाड़ों तथा नदी-नालों के किनारे अपने घर बनाए हुए हैं। बरसात के समय में भूस्खलन तथा
बाढ़ से क्षति पहुंचने की संभावना नियमित रूप से बनी रहती है।
अनेकों घर बरसात में ध्वस्त भी हो रहे हैं। हाल ही में शिमला जिला के चौपाल में एक चार मंजिला बिल्डिंग महज
10 सेकंड में ही जमींदोज हो गई थी जिसमें दो बैंक, एक ढाबा, एक शराब की दुकान और दो अन्य दुकानें चलती
थीं। 27 जुलाई 2022 को लोकसभा में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के मुताबिक भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण
(जीएसआई) ने वर्ष 2015 से 2022 तक विभिन्न राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों में 3782 प्रमुख भूस्खलनों की
घटनाएं दर्ज हुई हैं जिससे आम जनजीवन एवं आधारभूत ढांचा प्रभावित हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले
सात वर्षों के दौरान भूस्खलन की घटनाओं पर किए गए अध्ययन के मुताबिक केरल में 2239, पश्चिम बंगाल में
376, तमिलनाडु में 196, कर्नाटक में 184, जम्मू-कश्मीर में 184, हिमाचल प्रदेश में 101, अरुणाचल प्रदेश से 48,
असम से 169 और मेघालय से 48 घटनाएं सामने आईं। केरल में सर्वाधिक भूस्खलन की घटनाएं दर्ज हुई हैं, वहीं
हिमाचल प्रदेश छठे स्थान पर पहुंच गया है। यह प्रदेश के लिए चिंता का विषय है। हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण
विभाग की सडक़ों को बरसात से सबसे ज्यादा क्षति पहुंचती है। प्रदेश सरकार द्वारा अनेकों संवेदनशील स्थलों को
चिन्हित भी किया गया है ताकि प्रदेश में जान तथा माल की हानि को रोका जा सके। इसके अलावा आईआईटी
मंडी द्वारा भूस्खलन की घटनाओं से प्रदेश की जनता को अलर्ट करने हेतु अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार किया गया
है, जैसे भूस्खलन की घटना घटित होने वाली होती है, तो हुटर बजना शुरू हो जाता है। यह सिस्टम प्रदेश के
अतिसंवेदनशील 69 स्थानों पर स्थापित किया गया है।
हिमाचल प्रदेश के चंबा, किन्नौर, कुल्लूृ, मंडी, सिरमौर और शिमला जिले फ्लैश फ्लड, भूस्खलन, बादलों के फटने
जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं। हिमाचल प्रदेश आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार
हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति तथा किन्नौर में सबसे ज्यादा भूस्खलन की घटनाएं देखने को मिली हैं। हाल ही के
कुछ महीनों में हिमाचल प्रदेश के किन्नौर में भावानगर के पास अचानक भूस्खलन होने के बाद राष्ट्रीय राजमार्ग
05 अवरुद्ध, कुल्लू जिला में गड़सा घाटी के शिलागढ़ में बादल फटना, चंबा के बाड़मौर में भारी बारिश और बादल
फटना, बिलासपुर जिले के घुमारवीं उपमंडल के तहत पडऩे वाली पंचायत कुहमझबाड़ में बादल फटने, मंडी जिला
की बल्ह घाटी की कन्सा खड्ड का भयावह रूप मानव के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर देने वाली घटनाओं को
उजागर करता है। इन घटनाओं के अलावा भी हिमाचल प्रदेश के अनेक स्थानों पर भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई

है। इस प्राकृतिक आपदा के समय प्रदेशवासियों को बड़ी सजगता तथा समझदारी से काम लेना चाहिए। खराब
मौसम में घर से बाहर न निकलें। यदि आपका घर संवेदनशील भूमि पर बना हुआ है तो कुछ समय के लिए उस
स्थान को छोडक़र किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाएं।
मौसम विभाग तथा प्रशासन की नियमित रूप से जानकारी लेते रहें। घर के छोटे बच्चों, बुजुर्गों इत्यादि को भी घर
से बाहर निकलने से रोकना होगा। लोक निर्माण विभाग को भी सडक़ पर बढ़ती भूस्खलन की घटनाओं पर ध्यान
केंद्रित करना होगा क्योंकि प्रदेश में सडक़ मार्ग लोगों के आवागमन का प्रमुख स्त्रोत हैं। ऐसे में बरसात की इस
आपदा में मानव जीवन को सुरक्षित करना सरकार तथा प्रशासन का दायित्व भी बनता है। जो लोग भूस्खलन के
कारण बेघर हुए हैं उन्हें अतिशीघ्र सरकार द्वारा सहायता प्रदान करके उनके जीवन को पुनस्र्थापित करने का प्रयास
करना होगा। इसके लिए समाज की विभिन्न कल्याणकारी संस्थाओं का सहयोग भी लिया जा सकता है।

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