'आज़ादी का अमृत महोत्सव' और बलात्कारियों की रिहाई व सम्मान

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विनीत महेश्वरी (संवाददाता)

यह भी एक अजीब संयोग था कि स्वतंत्रता की 76 वीं वर्षगांठ के अवसर पर जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
दिल्ली में लाल क़िले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए अपने भाषण में महिला सशक्तिरण की बातें कर रहे
थे और स्वतंत्रता संघर्ष में महिलाओं की भूमिका को सम्मान देते हुये रानी लक्ष्मीबाई, झलकारी बाई, चेन्नम्मा,
बेगम हज़त महल जैसी वीरांगनाओं के बलिदान को याद करते हुये यह बता रहे थे कि विकास के लिए महिलाओं
का सम्मान कितना ज़रूरी है। जिस समय प्रधानमंत्री नारी शक्ति को समर्थन देने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुये
देशवासियों से रोज़मर्रा की जिंदगी में महिलाओं के प्रति मानसिकता बदलने की अपील कर रहे थे। जिस समय वे
अपने ओजस्वी भाषण में महिलाओं के प्रति इन शब्दों में भावुक अंदाज़ में चिंता जता रहे थे कि -'किसी न किसी
वजह से हमारे अंदर यह सोच आ गई है कि हम अपनी वाणी से, अपने व्यवहार से, अपने कुछ शब्दों से महिलाओं
का अनादर करते हैं' और इन्हीं शब्दों के साथ वे भारतवासियों से अपने दैनिक जीवन में महिलाओं को अपमानित
करने वाली हर चीज़ से छुटकारा पाने का संकल्प लेने का आग्रह करते हुये अमृत काल में देश की तरक़्क़ी में नारी
शक्ति का कई गुना योगदान देख रहे थे, तथा बेटियों को ज़्यादा अवसर व सुविधाएं देने की बात कह रहे थे
लगभग ठीक उसी समय गोधरा जेल से गुजरात सरकार की छूट नीति के तहत उम्रक़ैद की सज़ा पाए हुये गैंगरेप
के 11 दोषी गोधरा जेल से बाहर निकल रहे थे। स्वतंत्रता दिवस व आज़ादी के अमृतकाल की यह भी कितनी बड़ी
त्रासदी कही जायेगी कि जहां गुजरात सरकार ने इन बेशर्म बलात्कारियों को छोड़ने में तत्परता दिखाई वहीं इन
बलात्कारियों ने गोधरा जेल के बाहर बाक़ायदा एक ग्रुप फ़ोटो शूट कराया जिसमें प्रफुल्लित मुद्रा में नज़र आ रहे
इन सभी बलात्कारियों को मिठाइयां खिलाई गईं व इनको तिलक किया गया। आश्चर्य इस बात का भी है कि इनकी
मुद्रा व हाव-भाव को देखकर तो ऐसा प्रतीत ही नहीं हो रहा था कि ये बलात्कारी भेड़ियों का झुंड है बल्कि ऐसा लग
रहा था कि यह कोई तीर्थ यात्रियों का जत्था है जिन्हें तिलक, पुष्प वर्षा व मिष्ठान आदि से सम्मानित किया जा
रहा है।

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ग़ौरतलब है कि 27 फ़रवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के कुछ डिब्बों में गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन के पास
उपद्रवियों की बेक़ाबू भीड़ द्वारा आग लगाए जाने की वजह से 59 'कारसेवकों' की ज़िंदा जलकर मौत हो गयी थी।
उसके बाद गुजरात में मुस्लिम विरोधी दंगे भड़क उठे थे। दंगाइयों के हमले से बचने के लिए गुजरात के दाहोद
ज़िले के रंधिकपुर गांव की रहने वाली बिल्क़ीस बानो साढ़े तीन साल की अपनी एक बेटी सालेहा और 15 दूसरे
लोगों के साथ गांव से भाग गई थीं। बिल्क़ीस उन दिनों पांच महीने की गर्भवती भी थी। दंगाई दाहोद और आसपास
के इलाकों में बे रोक टोक क़हर बरपा रहे थे। वे चुन चुनकर मुसलमानों के घरों को जला रहे थे और उनके घरों के
सामान लूट रहे थे। दंगाइयों द्वारा इसी दौरान बिल्क़ीस व चार अन्य मुस्लिम महिलाओं को पहले तो ख़ूब मारा
पीटा गया फिर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। बिल्क़ीस की मां के साथ भी बलात्कार किया गया।
दंगाइयों के इस हमले में रंधिकपुर गांव में बिल्क़ीस की बेटी सहित उनके परिवार के सात सदस्य मारे गए ।
इस मामले में दायर की गई चार्जशीट में कहा गया है कि 12 दंगाई लोगों सहित 20-30 लोगों ने लाठियों और
ज़ंजीरों से बिल्क़ीस और उसके परिवार के लोगों पर हमला कर दिया था । इसी मामले में मुंबई में सीबीआई की
एक विशेष अदालत ने 2008 में बिल्क़ीस बानो के साथ गैंगरेप और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के
आरोप में 11 अभियुक्तों को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी। बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस सज़ा पर अपनी सहमति
की मुहर भी लगाई थी। परन्तु गत 15 अगस्त को गुजरात सरकार ने इन्हीं बलात्कारी दरिंदों को रिहा कर दिया।
बलात्कारियों के प्रति हमदर्दी की ऐसी ही प्रवृत्ति हाथरस गैंग रेप के मामले में भी उस समय देखी गयी थी जबकि
14 सितंबर 2020 को दलित समुदाय की बीस वर्ष की ग़रीब युवती अपनी मां के साथ अपने घर से लगभग आधा
किलोमीटर दूर घास काटने गई थी। वहीं उसी के गांव के रहने वाले तथाकथित उच्च जाति के चार अभियुक्तों ने
उस दलित लड़की का रेप किया। उसे गंभीर अवस्था में 28 सितंबर को दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल ले जाया
गया था जहां अगले दिन उसकी मौत हो गई थी। पुलिस ने परिवार को चेहरा दिखाए बिना तीस सितंबर को रात के
अंधेरे में खेतों में लड़की का अंतिम संस्कार कर दिया। उस समय भी बलात्कारियों के समर्थन में जातिवादी
मानसिकता रखने वाले लोग इकट्ठे हो गये थे। आज भी उस पीड़िता का परिवार अपने घर में दहशत व भारी
सुरक्षा के बीच रह रहा है।
इसी तरह 14 जनवरी 2018 को जम्मू के कठुआ में एक ग़रीब मुस्लिम लकड़हारे की आठ वर्षीय बेटी आसिफ़ा की
सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या कर उसका शव जंगल में फेंक दिया गया था। इस सामूहिक बलात्कार व हत्याकांड
में ग्राम प्रधान व मंदिर के पुजारी से लेकर कई पुलिस कर्मी भी शामिल थे। अदालत ने इन छः अभियुक्तों में से
तीन को उम्रक़ैद और अन्य तीन को पांच पांच साल की सज़ा सुनाई थी। यहाँ भी इन हत्यारे बलात्कारियों के पक्ष
में तिरंगा हाथों में लेकर जुलूस निकाले गये थे,धरना प्रदर्शन किया गया था। हैरानी तो यह कि इन प्रदर्शनों में
तत्कालीन जम्मू कश्मीर सरकार के कई भाजपाई मंत्री भी शामिल थे जो बलात्कारियों के पक्ष में केवल धर्म के
आधार पर खुलकर खड़े थे। देश में इसतरह की और भी कई घटनायें हो चुकी हैं जिनमें इसी प्रवृति व मानसिकता
के लोग बलात्कारियों, सामूहिक बलात्कार के दोषियों व हत्यारों के साथ खुलकर खड़े नज़र आये हैं।
इन परिस्थितियों में क्या प्रधानमंत्री द्वारा लाल क़िले से महिलाओं के प्रति व्यक्त की गयी चिंता का कोई मायने
भी रह जाता है? जब साधू के वेश में दिन के उजाले में भीड़ भरे माहौल में धर्म विशेष की महिलाओं को बलात्कार
की धमकी दी जाये, जब योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में उनके मंच से कोई वक्ता धर्म विशेष की महिलाओं को
क़ब्र से निकालकर उनकी लाशों से बलात्कार की धमकी दे,उस माहौल में आज़ादी के अमृत महोत्सव काल में

प्रधानमंत्री का बेगम हज़रत महल को याद करने का आख़िर क्या अर्थ रह जाता है?' आज़ादी के अमृत महोत्सव' के
बीच गोधरा में बिल्क़ीस के बलात्कारियों की रिहाई व उनका सम्मान एक बार फिर नारी सशक्तिकरण के दावों पर
सवाल खड़ा कर रहा है।

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