भ्रष्टाचार ज़मींदोज नहीं

विनीत माहेश्वरी (संवाददाता )

राजधानी दिल्ली के पड़ोस नोएडा में भ्रष्टाचार की जुड़वां इमारतें ज़मींदोज कर दी गईं। ऐतिहासिक
कुतुबमीनार से भी ऊंची इमारतें कुछ ही सेकेंड में ‘मलबा’ हो गईं। भ्रष्टाचार के खिलाफ इतनी ऊंची,
महंगी और सार्थक कार्रवाई कभी नहीं की गई। हालांकि केरल में चार टॉवर ध्वस्त किए जा चुके हैं,
लेकिन वे कम ऊंचे थे। देश में अब यह एक उदाहरण बन गया है, जिसके व्यापक संदेश हो सकते हैं
और भ्रष्टाचार की जमात खौफजदा हो सकती है। भारत में बिल्डर सबसे भ्रष्ट जमात में आते हैं, जो
आम आदमी को ‘घर’ का सपना दिखाते हैं और वह सपना लगातार लटकाए रखा जाता है। असंख्य
परिवार ‘कंगाल’ हुए होंगे, क्योंकि वे अपने संसाधनों का करीब 77 फीसदी हिस्सा ‘घर के सपने’ में
निवेश कर देते हैं। जो विवादित और दाग़ी इमारतें ध्वस्त की गई हैं, उनमें भी सैकड़ों परिवार रहते
थे। हालांकि सर्वोच्च अदालत का डंडा था, लिहाजा कंपनी ने पैसा लौटाया होगा अथवा वैकल्पिक फ्लैट
दिया होगा। हमारे सामने सत्यापित आंकड़े नहीं हैं, लेकिन टॉवर खाली करने और गिराने की अचानक
सूचना पाकर वे परिवार व्यथित और परेशान जरूर हुए होंगे। सर्वोच्च अदालत अपने आदेश पर अड़ी
रही, फिर भी ‘काली इमारतों’ को ज़मींदोज करने में करीब एक साल का वक़्त लग गया। इमारतें ढहा
दी गईं और कोई बड़ा नुकसान भी नहीं हुआ। बगल की एटीएस सोसायटी की एक दीवार गिर गई
और कुछ घरों की खिड़कियों के शीशे क्षतिग्रस्त हो गए।

बहरहाल यह हमारे देश की कंपनी एडिफाइस की प्रौद्योगिकी की भी परीक्षा थी, क्योंकि दोनों टॉवर
रिहायशी इलाके में थे। घनी बस्ती में बहुमंजिला इमारतें भी थीं और हजारों लोग उनमें बसे थे।
बहरहाल कुछ घंटों के लिए आसपास की सोसायटी भी खाली कराई गईं। जो इमारतें करीब 13 साल
में खड़ी हुई थीं, मात्र 9-10 सेकेंड्स में ही 30-32 मंजिलों के टॉवर भरभरा कर ‘मिट्टी’ हो गए। धुएं
का काला, गहरा गुब्बार छा गया, जिसने न्यूयॉर्क के विश्व व्यापार केंद्र के, आतंकी हमले के कारण,
विध्वंस की याद ताज़ा कर दी। चूंकि धूल के महीन कणों में विस्फोटक के अंश हो सकते हैं, जाहिर
है कि आसपास का पर्यावरण प्रभावित हुआ है। वैज्ञानिकों का आकलन है कि वायु प्रदूषण 5 गुना
बढ़ेगा और आम आदमी की सेहत पर उसके दुष्प्रभाव भी सामने आएंगे। मलबा करीब 80,000 टन
बताया जा रहा है, जिसमें करीब 4000 टन लोहा-इस्पात है। इस कार्रवाई में 3700 किलोग्राम
विस्फोटक लगाया गया था। हालांकि 3 महीने में मलबा साफ करने के दावे किए गए हैं, लेकिन
विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें 6 माह से अधिक समय भी लग सकता है। बहरहाल मौजू सवाल
तो यह है कि इन अवैध इमारतों के निर्माण में बिल्डर, नौकरशाह और नेताओं के जिस ‘नापाक
गठजोड़’ ने भ्रष्ट भूमिका निभाई थी, उसे कब ज़मींदोज किया जाएगा? दो ‘काली इमारतें’ ही
भ्रष्टाचार की मीनारें नहीं थीं। नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण में ‘भ्रष्ट कुबेर’ पकड़े जाते रहे हैं।
उनकी अंतिम नियति सार्वजनिक नहीं है। ये प्राधिकरण भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात रहे हैं। ध्वस्त की
गई इमारतों की योजना, भूमि, टॉवर के निर्माण और 9-10 मंजिल के बजाय 30-32 मंजिल तक
इमारतों को बढ़ाना और उठाना आदि जितने भी अहम फैसले लिए गए, वे उप्र में मुलायम सिंह यादव
और मायावती के मुख्यमंत्री काल के दौरान लिए गए। कुछ भूमिका मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव की
भी है।
सवाल है कि नए सिरे से उनकी भी जांच क्यों नहीं की जानी चाहिए? उप्र सरकार ने एसआईटी का
गठन किया था, जिसने 26 अधिकारियों को ‘नापाक’ पाया। सिर्फ चार को निलंबित किया गया और
शेष सेवानिवृत्त हो चुके हैं। क्या उनकी पेंशन से नुकसान की भरपाई नहीं की जानी चाहिए? सरकार
अपनी जांच का अध्ययन करे और भ्रष्ट, काले अफसरों को जेल की सलाखों के पीछे धकेल दे। यह
कोई सामान्य प्रकरण नहीं है। प्राधिकरण के भीतर ऐसी व्यवस्था की जाए, ताकि ‘नापाक गठजोड़’ न
बन पाए। इसमें से नेताओं को अलग कैसे करेंगे, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में वे ही ‘मास्टर’ होते
हैं? संसद ने 2016 में जो रेरा कानून पारित किया था, उसे पूरी तरह कारगर और पारदर्शी बनाने के
लिए संसद नए सिरे से पुनर्विचार करे। यदि सरकार अध्ययन कराएगी, तो पाप की ऐसी इमारतें कुछ
और भी सामने आ सकती हैं। आम आदमी ही प्रभावित होता है, लिहाजा रेरा का नियमन और
क्रियान्वयन नए सिरे से किया जाना चाहिए। भ्रष्टाचार लोकतंत्र को खोखला करता है, इसलिए इसे
हर सूरत में रोकना होगा। ऐसी व्यवस्था हो कि भ्रष्टाचार की सूरत में प्रभावशाली व्यक्ति पर भी
अंकुश लगे।